Wednesday, 29 August 2018

जोहार भोजली...


छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति प्रकृति पूजा की संस्कृति है। इसीलिए यहां की संस्कृति में प्रकृति से संबंधित अनेक पर्व और संस्कृति का दर्शन होता है। भोजली त्यौहार बहु बेटियों का त्यौहार है।सुहागिन महिलाएँ या कुंआरी कन्या एक बांस की टोकनी में मिट्टी भर कर धान ,जौं, उड़द बो हैं। इसे नागपंचमी के दिन अखाड़ा की मिट्टी लाकर बोया जाता था। लेकिन समय के साथ अखाड़ा की परंपरा विस्मृत होने लगी। आजकल इसे पंचमी से लेकर अष्टमी तिथि तक बोते देखा जाता है। इसे घर के अंदर छांव में रखा जाता है।इसे श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने वाले पर्व राखी के दिन या इसके दूसरे दिन राखी चढ़ाने के पश्चात विसर्जित किया जाता है।
इसे लगाने के बाद इसमें हल्दी पानी का छिड़काव करते हैं। रोज इसकी पूजा करते हैं। भोजली गीत गाकर सेवा करते हैं। दीपक जलाते हैं। इसे ही हम भोजली का पर्व कहते हैं।
देवी गंगा
देवी गंगा लहर तुरंगा
हमरो भोजली दाई के
भीजे आठो अंगा।
माड़ी भर जोंधरी
पोरिस भर कुसियारे
जल्दी जल्दी बाढ़व भोजली
हो वौ हुसियारे।
भोजली अंकुरित होकर मिट्टी से बाहर आ जाती है।उसके बढ़ने की गति कम है। तो गीत में कहा जाता है, कि गन्ना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। सिर भर ऊंचा हो गया है। जोंधरा घुटने भर ऊंचा हो गया। भोजली जल्दी जल्दी बढ़ो और गन्ने के बराबर हो जाओ।
आई गई पूरा
बोहाई गई मालगी।
सोन सोन के कलगी।।
लिपी डारेन पोती डारेन
छोड़ी डारेन कोनहा।
सबो पहिरे लाली चुनरी,
भोजली पहिरे सोना।।
आई गई पूरा,
बोहाई गई झिटका।
हमरो भोजली देवी ला
चंदन के छिटका।।
विसर्जन के दिन किसी पवित्र जलाशय के पानी में भोजली को ठंडा करते हैं, तो उसकी मिट्टी बह जाती है और सुनहरे रंग की भोजली बच जाती है। घर के अंदर रखने के कारण यह पीले रंग का हो जाता है। इसे ही कहते हैं कि यह सोने से लदी है। उसके पत्तों पर भूरे रंग के दाने पड़ जाते हैं, उसे ही कहते हैं कि उसके ऊपर चंदन का छिटा है।
"कुटी डारेन धान
पछिन डारेन भूसा
लइके लइका हावन भोजली
झनि करिहो गुस्सा।"
घर के बेटियां घर का काम निपटा कर आती हैं। और कहती है। कि हम लोग धान कूट रहे थे।उसे फटक कर चाँवल और भूसा अलग किये। उसके बाद तुम्हारे पास आये हैं। देर हो गई इस लिए गुस्सा मत होना। एक मानव दूसरे प्रकृति के मानव रुप से बात कर रहे हैं। भोजली सबके मन में बस जाती है। उसको बढ़ते हुए रोज देखते हैं ।उसकी सुंदरता का वर्णन करते हैं-
कनिहा म कमर पट्टा
हाथे उरमाले।
जोड़ा नारियल धर के भोजली
जाबो कुदुरमाले।।
नानमुन टेपरी म बोयेन जीरा धाने।
खड़े रइहा भोजली
खवाबो बीरा पान।।
कमर में सोने का कमर पट्टा पहनी है। हाथ में रुमाल और जोड़ा नारियल लेकर भोजली कुदुरमाल मेला जायेंगे।भोजली वहां पर खड़े रहना तुम्हे बीड़ा पान भी खिलायेंगे। भोजली को कुदुरमाल ले जाने के लिये बोल रहे हैं। अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग गीत गाये जाते हैं। कह सकते हैं कि लोक गीत गढ़े जाते हैं।
आठे के चाउर
नवमी के बोवाइन।
दसमी के भोजली
दूदी पाना होइन।
दुआस के भोजली
मोती पानी चढ़िन।
तेरस के भोजली
रहसि बिंहस जाइन।
चौदस के भोजली
पूजा पाहुर पाइन।
पुन्नी के भोजली
ठंडा होये जाइन।
इस गीत में कब कब क्या किये इसका वर्णन है। बोने का काम नागपंचमी के दूसरे दिन करते हैं पर कभी सातवें या आठवें दिन भी बोते हैं।दसवीं के दिन दो पत्ते निकलते हैं। दुआस के दिन भोजली का रुप निखर जाता है। तेरस को भोजली लहस जाती है मतलब अपने पूरे यौवन में रहती है। चौदस के दिन इस भोजली की पूजा करते हैं।पुन्नी के दिन यह पहुना भोजली अपने घर वापस जाती है। जल से और मिट्टी से निकली भोजली वापस चली जाती है। मिट्टी, मिट्टी में और उसका जल, जल में मिल जाता है। यह भोजली भी विसर्जित हो जाती है।कुछ भोजली को ले आते हैं। जाते समय का दुख भी गीत में दिखाई देता है। भोजली के पत्तों पर पानी की बूंद रह जाती है उसे उसका आँसू समझा जाता है।
"हमरो भोजली दाई के निकलत हे आँसू"
इस भोजली के अलग रंग रूप अलग-अलग राज्यों में दिखाई देता है। मध्यप्रदेश में इसे " भोजलिया" कहते हैं। कहीं पर " कजरी " कहते हैं। इसे गढ़वाल में भी मनाते हैं पर वह सावन में ही खतम हो जाता है।वहां पर इसे भाइयों के लिए बहने बोती हैं।
छत्तीसगढ़ में यह मितानी याने मित्रता का प्रतीक है। दस दिन तक घर में रखने के बाद बेटियां या बहुएँ इसे सिर पर या हाथ में लेकर तालाब में ठंडा करने जाती हैं। राखी के दूसरे दिन इसे ठंडा किया जाता है। तालाब के पार या पचरी को साफ करके रखते हैं। ठंडा करते समय इसे गांव की गलियों में घुमाया जाता है। गाँव के घरों के सामने से गुजरते हैं, तो वे लोग उसकी पूजा करते हैं। तालाब में भोजली को रख कर उसकी पूजा करते हैं। उसके बाद उसे आँखो में आँसू भरकर ठंडा करते है।
भोजली का मानवीकरण करके पूजा करना उससे बातें करना सबके मन में प्यार पैदा कर देता है। बहुत ही प्यार से मिट्टी को पानी में धोया जाता है।उसके बाद भोजली को विसर्जित करते हैं।कुछ भोजली को रख लेते हैं। टोकनी में भोजली को रख कर बड़ों को देकर प्रणाम करते हैं। छोटों को देकर प्यार देते हैं। शइसके अलावा इस दिन एक दूसरे के कान में खोंच कर एक नारियल देकर मित्रता बदते हैं। भोजली में भोजली देकर मित्रता बदते हैं वह तीन पीढ़ी तक तो चलती है।यह रिस्ता सगे से भी बड़कर होता है।
लोग एक दूसरे के घर आते जाते हैं रहते हैं।एक दूसरे को बहुत सम्मान देते हैं। इसमें मित्रता करने वाले एक दूसरे का नाम नहीं लेते हैं। एक दूसरे को भोजली कहते हैं। इसी प्रकार से दौनापान, जंवारा, महाप्रसाद भी बदते हैं। यह सब अलग अलग समय पर होता है पर भोजली हमारे लिये मित्रता दिवस ही है।

Friday, 3 August 2018

आदि धर्म जागृति संस्थान का बैनर....


आदि धर्म जागृति संस्थान का मोनो..


बैठक...अखबार में...



छत्तीसगढ म 36 नंदिया .....























छत्तीसगढ म 36 नंदिया फेर 36 गति हो जाथे
खेत-खार सुक्खा रहिथे कारखाना मजा उड़ाथे
जीना होही मुश्किल जब तक बनही अइसे नीति
कुआं-बावली-बोरिंग सबके मरे कस होही गति
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो. 9826992811

भिलाई में कार्यकर्ताओ की बैठक...

आदि धर्म जागृति संस्थान के विस्तार के संबंध में भिलाई में कार्यकर्ताओ की बैठक आयोजित की गई। इस अवसर पर "आखर अंजोर" की प्रति प्रमुख सदस्यो को भेंट की गई

* राज्य निर्माण और अस्मिता की दशा पर संगोष्ठी आयोजित





* पुरखों के स्वप्न को साकार करने पुनः संघर्ष का रास्ता अख्तियार करने की आवश्यकता
रायपुर। "आदि धर्म जागृति संस्थान" की संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने राज्य निर्माण के पश्चात भी यहां की अस्मिता के संवर्धन के लिए कोई ठोस काम नहीं किए जाने की बात कही। "राज्य निर्माण और अस्मिता की दशा" विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि, अलग राज्य के लिए संघर्ष का उद्देश्य ही था, कि यहां की भाषा की, यहां की संस्कृति की और सम्पूर्ण अस्मिता की स्वतंत्र पहचान बने, किन्तु अब लगता है कि राज्य आन्दोलन में अपना सर्वस्व अर्पित कर देने वाले पुरखों के स्वप्न को साकार करने के लिए पुनः संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना होगा।
सिविल लाईन स्थित वृंदावन हाल में आदि देव के चित्र पर ज्योति प्रज्वलित करने एवं संस्थान की प्रदेश महिला प्रभारी, लोक गायिका ज्योति चंद्राकर द्वारा छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना प्रस्तुत करने के पश्चात् प्रारम्भ हुई संगोष्ठी को मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, समाजसेवी एवं छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद ने कहा कि छत्तीसगढ़ की मूल पहचान के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य की पहचान वहां की भाषा और संस्कृति से होती है, लेकिन राज्य निर्माण के पश्चात भी यहां की सरकारें इसकी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के लिए कोई भी ठोस कार्य नहीं नहीं कर रही हैं। खाना पूर्ति के लिए प्रदेश स्तर पर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया है। राजभाषा आयोग की स्थापना कर दी गई है, लेकिन जमीनी तौर पर राजभाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है। 
गोंडी धर्म गुरु ठाकुर कोमल सिंह मरई ने कहा कि आज छत्तीसगढ़ की भौगोलिक चिन्हांकन भले ही एक छोटी इकाई के रूप में हमारे सामने है, किन्तु इसका मूल विस्तार बहुत वृहद है। अमरकंटक की सम्पूर्ण नर्मदा घाटी श्रृंखला से लेकर ओडिशा प्रांत के खड़ियार रोड तक मूल छत्तीसगढ़ का वृहद क्षेत्र है, जहां की सम्पूर्ण संस्कृति को इसके मूल रूप स्थापित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यहां की मूल संस्कृति को समझने के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ ही गोंडी भाषा को भी समझने की आवश्यकता है। 
विशेष अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दे रहीं समाज सेविका श्रीमती मिथिला खिचरिया ने कहा कि नया छत्तीसगढ़ राज्य अब 18 वर्ष का हो गया है, यानि कानूनी तौर पर परिपक्वता की अवस्था में आ गया है, इसलिए अब आवश्यक है कि इसका परिपक्व स्वरूप दिखाई दे। पुरखों के दिखाए गये मार्ग पर चलते हुए, लोक संस्कृति को जीवंत करते हुए आदि धर्म की स्थापना की जाए। संस्थान के बिलासपुर संभाग के संयोजक, अस्मिता एवं स्वाभिमान के संपादक भुवन वर्मा ने यहां के मूल आदि धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए निरंतर कार्य करने का आव्हान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष सुशील भोले ने यहां की संस्कृति के नाम पर जितने भी शोध कार्य हुए हैं, लोगों को विश्वविद्यालयों के माध्यम से उपाधियां बांटी गईं हैं, उन सभी की पुनर्समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए यहां के मूल निवासी वर्ग के विद्वानों की एक समिति गठित की जानी चाहिए और उनके माध्यम से उन सभी शोध ग्रंथों का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यहां की संस्कृति और इतिहास के नाम पर अंधा बांटे रेवड़ी की तर्ज पर उपाधियां बांटी गईं हैं, जिसके चलते यहां की मूल पहचान आज भी स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हो सकी है।
शिक्षाविद् डा. शंकर यादव ने कहा कि शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और खेलकूद जैसे सभी क्षेत्र में कारगर उपाय किए जाने की आवश्यकता है। प्रो. लक्ष्मण प्रसाद मिरी ने पारम्परिक खान-पान, लोकाचार और जीवन पद्धति को प्राचीन रूप में आत्मसात किए जाने की बात कही। संगोष्ठी में डा. सुखदेव राम साहू, सुधा वर्मा, रामकुमार साहू, चेतन भारती, कृष्ण कुमार वर्मा, मनोरमा चंद्रा ने भी अपने विचार रखे।
वरिष्ठ साहित्यकार चेतन भारती, राजिम से पधारी कवयित्री केवरा यदु, संस्थान की सांस्कृतिक सचिव अरुणा व्यास मिरी, आशा पाठक, राजेश्वरी वर्मा, गीता वर्मा, सावित्री वर्मा, नेहरू लाल यादव, मनोरमा चंद्रा ने अस्मिता पर आधारित काव्यपाठ किया।
इस अवसर पर रामशरण कश्यप, कमल निर्मलकर, भोलेश्वर साहू, भगवान सिंह अहिरे, भगत ध्रुव, सत्यभामा ध्रुव, प्रियंका मरकाम, सावित्री वर्मा, राजेन्द्र चंद्राकर, मीना साहू, शारदा देवी साहू, डा. रेखा वर्मा, भारती वर्मा, अरुण वर्मा, चैतराम नेताम, मनहरण चंद्रा, मुकेश शर्मा, दिलीप ताम्रकार, सफदर अली सफदर, हर्षवर्धन साहू, दिलीप सिंह सहित अनेक अस्मिता प्रेमी उपस्थित थे।