Friday, 12 January 2018

राजिम मेला बनाम काल्पनिक कुंभ.....


छत्तीसगढ की संस्कृति मेला-मड़ई की संस्कृति है। यहां के लोक पर्व मातर के दिन मड़र्ई जागरण के साथ ही यहां मड़ई-मेला की शुरूआत हो जाती है, जो महाशिव रात्रि तक चलती है।

मड़ई का आयोजन जहां छोटे गांव-कस्बे या गांवों में भरने वाले बाजार-स्थलों पर आयोजित कर लिए जाते हैं, वहीं मेला का आयोजन किसी पवित्र नदी अथवा सिद्ध शिव स्थलों पर आयोजित होता चला आ रहा है। इसी कड़ी में राजिम का प्रसिद्ध मेला भी कुलेश्वर महादेव के नाम पर आयोजित होता था। बचपन में हम लोग आकाशवाणी के माध्यम से एक गीत सुनते थे- "चलना संगी राजिम के मेला जाबो, कुलेसर महादेव के दरस कर आबो।" लेकिन अभी कुछ वर्षों से यह मेला काल्पनिक कुंभ का नाम धारण कर लिया है।

जहां तक इस मेला को भव्यता प्रदान करने की बात है, तो इसे हर स्तर पर स्वागत किया जाएगा।किन्तु इसका नाम और कारण को परिवर्तित करना किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ बूढादेव के रूप में शिव संस्कृति का उपासक रहा है, तब भला किसी अन्य देव के नाम पर भरने वाला कुंभ या मेला के रूप में कैसे आत्मसात किया जा सकता है। कितने आश्चर्य की बात है, कि यहां के तथाकथित बुद्धिजीवी या जनप्रतिनिधि इस पर कभी कोई टिका-टिप्पणी करते नहीं देखे गए। अपितु वहां आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में भागीदारी पाने के लिए लुलुवाते हुए या अपने पत्र-पत्रिका के लिए विज्ञापन उगाही करने के अलावा और कुछ भी करते नहीं पाए गये।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है, कि यहां के तथाकथित संस्कृति और इतिहास के मर्मज्ञों को भी यह समझ में नहीं आया कि महाशिव रात्रि के अवसर पर भरने वाला मेला महादेव के नाम पर भरा जाना चाहिए या किसी अन्य के नाम पर?

मित्रों, जिस समाज के बुद्धिजीवी और मुखिया दलाल हो जाते हैं, उस समाज को गुलामी भोगने से कोई नहीं बचा सकता। आज छत्तीसगढ अपनी ही जमीन पर अपनी अस्मिता की स्वतंत्र पहचान के लिए तड़प रहा है, तो वह ऐसे ही दलालों के कारण है। शायद यह इस देश का एकमात्र राज्य है, जहां मूल निवासियों की भाषा, संस्कृति और लोग हासिए पर जी रहे हैं और बाहर से आकर राष्ट्रीयता का ढोंग करने वाले लोग तमाम महत्वपूर्ण ओहदे पर काबिज हो गये हैं।

इस देश में जिन चार स्थानों पर वास्तविक कुंभ आयोजित होते हैं, वे भी शिव स्थलों के नाम पर जाने और पहचाने हैं, तब यह काल्पनिक कुंभ क्यों नहीं कुलेश्वर महादेव के नाम पर पहचाना जाना चाहिए?

-सुशील भोले
संयोजक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर
मो .नं. 9826992811

Wednesday, 10 January 2018

देख कबीरा सुन्ना परगे, धरम के....

देख कबीरा सुन्ना परगे, धरम के रद्दा उन्ना परगे
लंदी-फंदी के करनी म माथ धरे फेर गुन्ना परगे
छोल-चांच के रद्दा बनाए, सत् के रथ आगू बढाए
कागद-कलम-मसि के लेखा ले, अड़हा मनला ज्ञान गढाए
भेंड़िया धसान के रेंगना म, फेर इहू म घुन्ना परगे----
चारोंमुड़ा पाखण्ड नाचत हे, भोगी मन नवा रूप खापत हें
सत्-सेवा के मायाजाल म, यौवन के आगी तापत हें
बड़े-बड़े बंगला बनथे अब, आश्रम के रूप जुन्ना परगे---
कइसे करी मानवता रक्षा, यक्ष-प्रश्न फेर आज खड़े हे
धरम के ठेकादार-गौंटिया, चारोंमुड़ा निर्लज्ज अड़े हे
परमारथ के कारज म, कांटा-खूंटी अब दुन्ना परगे---

-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

पर्व और मान्यताएं.....

हमारे यहां बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग समुदायों के द्वारा अलग-अलग अवसर पर या अलग-अलग संदर्भों के अंतर्गत मनाया जाता है। उदाहरण के लिए हम "नवा खाई" का पर्व ले सकते हैं।

छत्तीसगढ में "नवा खाई" का पर्व तीन अलग-अलग अवसरों पर मनाया जाता है। अनुसूचित जाति के अंतर्गत आने वाले कई समाज के लोग इसे ऋषि पंचमी को, जो कि भादो मास को संपन्न होने वाले गणेश चतुर्थी के पश्चात् आता है, उस दिन मनाते हैं।

अनुसूचित जन जाति के अंतर्गत आने वाले कई समाज के लोग इसे कुंवार मास की दशहरा तिथि को मनाते हैं। इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग कार्तिक मास में मनाए जाने वाले दीपावली पर्व के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर मनाते हैं।

नवा खाई पर्व मनाने का सभी का उद्देश्य एक ही है, अपने ईष्ट को अपनी नई फसल को समर्पित करना। किन्तु अलग-अलग तिथि और अलग-अलग रूप में इसे मना लिया जाता है। ऐसे ही बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग संदर्भ के अनुसार अलग-अलग समूह के लोग मनाते हैं।

हम "छेरछेरा" पर्व को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। गोंडवाना की संस्कृति को मानने वाले लोग इसे "गोटुल/घोटुल" की शिक्षा में पारंगत हो जाने के पश्चात पूस पूर्णिमा के अवसर पर तीन दिनों का पर्व मनाते हैं।

यहां के मैदानी भाग में रहने वालो अन्य पिछड़े और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग केवल एक दिन का पर्व फसल की लुवाई-मिंजाई के पश्चात् अन्न दान के रूप में मनाते हैं। इन सबसे अलग मुझे अपने साधना काल में जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके अनुसार यह पर्व शिव जी द्वारा पार्वती से विवाह पूर्व लिए गये परीक्षा के अंतर्गत नट बनकर मांगा गया भिक्षा का प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।

मित्रों, यहां यह जानना आवश्यक है कि यहां के हर पर्व का संबंध किसी न किसी रूप में अध्यात्म से अवश्य है। आज हम उचित जानकारी के अभाव में उसे अन्य संदर्भों के अंतर्गत मनाये जाने को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सभी पर्वों का मूल कारण जानने के लिए कागजी प्रमाणों से ऊपर उठ कर तर्क और लोक परंपरा की कसौटी पर उसे परखना आवश्यक है।

यहां पर मैं "होली" पर्व को उदाहरण के रूप में रखना चाहूंगा। हम आम तौर पर यह जानते हैं कि "होलिका दहन" के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है। जहां तक हम छत्तीसगढ की मूल संस्कृति के संदर्भ में बात करें तो यह सही नहीं है।यहां जो पर्व मनाया जाता है, वह "काम दहन" का पर्व है। इसीलिए हम इसे "मदनोत्सव" या "वसंतोत्सव" के रूप में भी मनाते हैं।
आप सभी को यह स्मरण होगा कि शिव पुत्र के हाथों मरने का वरदान प्राप्त ताड़कासुर के संहार के संहार के लिए तपस्यारत शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा गया था। तब कामदेव वसंत का मादक भरे मौसम का चयन कर अपनी पत्नी रति के साथ शिव तपस्या भंग करने का प्रयास कर रहे थे। इस पर शिव जी कुपित हो गये और कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिए।

हमारे छत्तीसगढ में इसी लिए इस पर्व को वसंत पंचमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक लगभग चालीस दिनों का पर्व मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन अरंडी नामक पौधे को होली दहन स्थल पर गड़ाया जाता है, जो कि कामदेव के आगमन के प्रतीक स्वरूप होता है। उसके पश्चात् वासनात्मक गीतों और नृत्यों के माध्यम से फाल्गुन पूर्णिमा तक इस पर्व को मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा को होली दहन स्थल पर एकत्रित लकड़ी आदि में अग्नि संचार के पश्चात यह पर्व संपन्न होता है।
आप सोचिए, होलिका तो एक ही दिन में लकड़ी एकत्रित करवा कर उसमें अग्नि प्रज्वलित करवाती है, और स्वयं ही उसमें जलकर भस्म हो जाती है। फिर उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने की क्या आवश्यकता है? इस पर्व के अवसर पर प्रयोग किए जाने वाले वासनात्कम शब्दों, दृश्यों और नृत्यों से होलिका का क्या संबंध है? 

मित्रों, मैं हमेशा यह कहता हूं कि यहां की मूल संस्कृति को उसके वास्तिवक रूप में पुनः लिखने की आवश्यकता है, तो उसका यही सब कारण है।

-सुशील भोले
संयोजक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

मया के भाखा अब्बड़ अटपट ...





















मया के भाखा अब्बड़ अटपट नइ समझावय झटपट
बिन गुने अंतस के भाव कर लेथे जउंरिहा खटपट
रद्दा आय ए जीव-शिव के एकेच रंग म रंग जाए के
आत्मा ले आत्मा संग मिल के नवा जगत सिरजाए के

-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

Sunday, 31 December 2017

सुशील भोले सम्मानित..



साहित्य संदेश बागबाहरा द्वारा ग्राम खोपली में स्व . मेहतर लाल साहू स्मृति कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह में कवि सुशील भोले को स्व . नारायण लाल परमार स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। 25 दिसंबर को आयोजित इस गरिमामय आयोजन में धनराज साहू, सुनिल शर्मा नील, मनीराम साहू, अशोक शर्मा, हरिकृष्ण श्रीवास्तव, रूपेश तिवारी, सहित अनेक कवि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

इस अवसर पर ग्राम खोपली में आयोजित कवि सम्मेलन में आमंत्रित कवि सुशील भोले, सुनिल शर्मा नील, मनीराम साहू मितान, शशिभूषण स्नेही, सलीम कुरैशी, राजेन्द्र श्रीवास्तव, हबीब खान समर, हरिकृण श्रीवास्तव आदि ने देर रात तक श्रोताओं को कविता रस से सराबोर किया।25 दिसंबर को आयोजित कवि सम्मेलन का संचालन अशोक शर्मा ने एवं आभार प्रदर्शन के साथ ही छत्तीसगढी के प्रथम गजलकार स्व. मेहतर राम साहू जी की कविता का पाठ उनके सुपुत्र धनराज साहू ने किया।

जा रे मोर गीत तैं खदर बन ...

जा रे मोर गीत तैं खदर बन जाबे
बिना घर के मनखे बर घर बर जाबे
बने अस देखत जाबे कोनो भूख झन मरय
पेट के अगनिया बर लइका कोनो झन बेंचय
अइसन कहूं देखबे चाउंर बन जाबे---

इहू चेत करबे तैं छइहां सबला मिलय
ककरो करम ल रे घाम झन चरय
कोनो जरही भोंभरा त रूख-डार बन जाबे--

गांव-गांव किंजर के तैं खेत देखबे बढिया
तभे तो चढही चुल्हा म अन्न के रे हंड़िया
सुक्खा दिखत खेत बर बादर बन जाबे--

जभे दिखही सबो झन के चेहरा म हांसी
तब तहूं सुरता के थोरिक खा लेबे बासी
नइते अइसने सरी उमर बीताबे---

-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

संस्कृति और सम्मान...

(संदर्भः आंग्ल नव वर्ष का विरोध)
हमारी संस्कृति दुनिया की हर संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करना सिखाती है, इसीलिए पूरे विश्व को अपना परिवार मानने की शिक्षा दी जाती है। जो लोग अन्य संस्कृति, परंपरा या सभ्यता का सम्मान करने के बजाय उसके विपरित विष वमन करते हैं, ऐसे लोग कदापि धर्म के जानकार या रक्षक नहीं हो सकते। ऐसे लोगों को मूर्ख और उससे भी बढकर धूर्त कहा जाना उचित होगा। साथ ही यह भी उचित होगा कि ऐसे लोगों की बातों की उपेक्षा की जाए, उन्हें अमान्य किया जाए।

-सुशील भोले
संयोजक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811