Tuesday, 27 June 2017

कर के साज-संवांगा बेटी....

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना

































कर के साज-संवांगा बेटी देख होगे हे तइयार
अरे मंदरिहा ताल बजा, झन कर रे मुंधियार
हमर संस्कृति के निसदिन होही तभे बढ़वार
नवा पीढ़ी जब अगुवा बनके आही खेवनहार

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Wednesday, 14 June 2017

"आखर अंजोर" विमोचित...




छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर सुशील भोले द्वारा लिखे गये आलेखों का संकलन "आखर अंजोर" का 12 जून को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के हाथों विमोचन हुआ। राजधानी रायपुर के सिविल लाईन स्थित मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित विमोचन कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ बीज विकास निगम के अध्यक्ष श्री श्याम बैस, वरिष्ट शिक्षाविद् डा. सुखदेव राम साहू, समाजसेवी रामशरण कश्यप एवं पत्रकार भूपेन्द्र वर्मा सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। लेखक सुशील भोले ने सभी आमंत्रित अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ के मूल धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करने का आव्हान किया है।

Saturday, 10 June 2017

चंदा उसका नाम सखी रे ...





















खामोशी में नयन-शब्द से जो मन की बातें करती है
चंदा उसका नाम सखी रे, हृदय-कमल में रहती है..

चंचल-चपल मृगनयनी सी, प्रेमावन की है बाला
अपने अधरों से ही पिलाती, मादक प्रेम का जो हाला
मेरे गीतों में राग सुहानी, सरगम बन वह झरती है...

दूर देश की है वह पंछी, मन-बगिया में खेल रही
विरह-वेदना की ज्वाला को, जो बरसों से झेल रही
फिर आलिंगन में आने से, नाहक काहे वो डरती है...

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

लइका मनला नान्हे पन ले ...













लइका मनला नान्हे पन ले पूजा-पाठ संग जोरव
देव-कृपा के निरमल लहरा म सुघ्घर बने बोरव
खुलथे रद्दा एकरेच ले जम्मो बढ़वार के संगवारी
ज्ञान-संस्कार पाए के पाछू तब महकाहीं फुलवारी

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Friday, 2 June 2017

तोर हमर संगी कइसे जुरही मितानी...
















तोर हमर संगी अब तो कइसे जुरही मीत-मितानी
हम करथन आरुग ज्ञान-गोठ, तैं गढ़थस कहानी
परबुधिया नइ रहिन अब लोगन पढ़ बनगे हें ज्ञानी
हंस बरोबर अलगिया देथें इन तो सिरतो दूध-पानी

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Tuesday, 9 May 2017

"आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ...

छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर मेरे द्वारा लिखे गए आलेखों का संकलन "आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ...

विश्वास है, यह संकलन यहां के मूल धर्म और संस्कृति पर अपने नाम के अनुरूप "अक्षर का प्रकाश " फैलाएगा...

"आखर अंजोर " के आवरण पर अंकित चित्र तेज रूप में संपूर्ण ब्रम्हाण्ड में व्याप्त परमात्मा का प्रतीक स्वरूप है। साधना काल में साधक को  ध्यानावस्था मेंं वह "काले रंग का अर्द्ध र्गोलाकार" दिखाई देता है। उसका ऊपरी आवरण "हल्का सा लालिमा" लिए हुए रहता है। हमारी संस्कृति में शिव लिंग को "काला अर्द्ध गोलाकार" बनाने की जो परंपरा है, उसका मूल कारण यही है।

Sunday, 7 May 2017

शिव लिंग की वास्तविकता....



आध्यात्मिक जगत में बहुत से ऐसे बहुरूपिए और षडयंत्रकारी लोग भी आते रहे हैं, जिनके कारण इसका वास्तविक स्वरूप और मूल दर्शन भ्रमित होता रहा है। कई मनगढ़ंत किस्सा-कहानी और मूर्खता की पराकाष्ठा को लांघ जाने वाली परंपरा भी इन सबके चलते हमारे बीच स्थान बनाने में सफल रही हैं। शिव लिंग के संबंध में ऐसे अनेक कहानी और तर्क-वितर्क भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

 साधना काल से पूर्व और अब भी यदा-कदा ऐसे बेहुदा प्रसंग मेरे समक्ष निर्मित हो जाते हैं। आश्चर्य होता है, लोग ऐसी असभ्य बातें कितनी आसानी से कह जाते हैं। जब शिव लिंग को पुरूष प्रतीक और जलहरी को स्त्री (या पार्वती) प्रतीक के रूप में चिन्हित कर उसे अश्लील रूप दिया जाता है, और लोगों को इसकी पूजा से विलग रहने की समझाइश दी जाती है।

 निश्चित रूप से ऐसे लोग शिव लिंग की वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हैं। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है, कुछ अन्य पंथावलंबी ऐसी घृणित कहानियाँ गढ़ शिव जी को छोटा बताकर अपने ईष्ट को बड़ा या श्रेष्ठ बताने की कोशिश करते हैं।

 वास्तव में शिव लिंग सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में तेज रूप में व्याप्त परमात्मा का प्रतीक स्वरूप है। हमें साधना काल में इसका बोध होता है। ध्यानावस्था में बैठा साधक जब उच्चावस्था को प्राप्त करता है, तब उसकी दिव्य दृष्टि जागृत होने लगती है। इसी अवस्था में उसे अपने चारों ओर तेज स्वरूप में व्याप्त परमात्मा अद्र्ध गोलाकार के रूप में दिखाई देने लगते हैं। यह अर्द्ध गोलाकार लगभग काला (कभी गाढ़ा बैगनी) रंग का दिखाई देता है। उसका ऊपरी आवरण (परत) हल्का सा लालिमा लिए हुए दिखाई देता है। हमारी संस्कृति में शिव लिंग को अर्द्ध गोलाकार निर्मित करने की परंपरा भी शायद इसी के चलते है, कि सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में तेज रूप में व्याप्त परमात्मा साधक को उच्चवस्था प्राप्त करने पर वैसा ही दिखाई देते हैं।

 मित्रों, मैं हमेशा यहाँ के आध्यत्मिक दर्शन को पुनर्लेखन और संशोधन की बात करता हूं, तो उसका मूल कारण ऐसे ही कुतर्क भरे किस्सा कहानियों के जंजाल से मुक्त होने के लिए ही कहता हूं। आइए, इस देश के मूल धर्म को उसके मूल रूप में पुनर्धारण करें। सर्वव्यापी परमात्मा को उसके मूल प्रतीक (लिंग) रूप में स्वीकार करें।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684