Thursday, 17 August 2017

धरम युद्ध के फेर बेरा हे ...













धरम युद्ध के फेर बेरा हे सुन कान्हा हमर देश म
जगा-जगा हे कंस-दुसासन किंजरत उज्जर भेष म
तोर अगोरा होवत हे अब पांच्यजन्य के नाद कर
जतका लबरा-पाखण्डी हें, मारे के शुरूआत कर

🌷सुशील भोले-9826992811

Tuesday, 8 August 2017

पशुपतिनाथ आश्रम में वरिष्ठ साहित्यकार...



सिलतरा में शीघ्र प्रारंभ हो रहे पशुपतिनाथ आश्रम में वरिष्ठ साहित्यकार सुधा वर्मा जी एवं  मनोरमा-मनहरण चंदऱा जी के साथ मैं सुशील भोले

सच के सुजी ह बस ...

सच के सुजी ह बस नानेकुन होथे
फेर लबराही फुग्गा ल फुस ले कर देथे
कतकों पोत पाउडर चेहरा चमकाए बर
फेर बेरा के ताप ह करिया के छोड़थे
🌷सुशील भोले 9826992811

पशुपतिनाथ आश्रम होगा फिर प्रारंभ,...... समाचार



Monday, 31 July 2017

अब गहिरा रे बादर...

अब्बड़ होगे सिटिर सिटिर अब गहिरा रे बादर
जिहां जरूरत होथे तिहां तैं बरसस नहीं काबर
कतकों जगा सुक्खा परे हे दिखथे दुकलहा छापा
छोड़ वोती गैरी मताना इहां बरस जा थोरिक आगर

🐦सुशील भोले-9826992811

Wednesday, 26 July 2017

हमर वासुकी नागदेवा...
















शिव बाबा के जम्मो बुता म सबले अगुवा रहिथे
सुख-दुख जम्मो बीपत ल संग-संग वोकरे सहिथे
मया-आशीष देना हो चाहे करना हो काकरो सेवा
सदा चौकन्ना रहिथे संगी हमर वासुकी नागदेवा

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

आय नर-मादा के घाटी...

गजब गरब के भुइयां आय हमर छत्तीसगढ माटी
इहें मानव जीवन सिरजे हे आय नर-मादा के घाटी
सृष्टिकाल के जीवन-दर्शन इहें आज घलो जीयत हे
आवौ छांट-निमार-उजरा के एला दुनिया म बांटी

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

तेज के रूप म संचरे हावय .


















तेज के रूप म संचरे हावय परमात्मा चारों अंग
ध्यान के बेर दिखथे साधक ल जेकर करिया रंग
ऊपर म लाली अंजोर बरोबर रहिथे वोकरे संग
उही प्रतीक आय जेला हम कहिथन  शिवलिंग

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Saturday, 22 July 2017

बइगा बबा के जम्मो चेला जगाहीं मंतर

















बइगा बबा के जम्मो चेला जगाहीं मंतर शक्ति
आदि धरम के परब हरेली दिखही श्रद्धा भक्ति
गांव-गांव म उत्सव मनाहीं जम्मो मूल निवासी
तब मया-आशीष गजब बरसाहीं भोले-कैलासी


🌷सुशील भोले-9826992811

रच-रच रच-रच गेंड़ी चघबो..








रच-रच रच-रच गेंड़ी चघबो आगे हरेली तिहार
जम्मो मूल निवासी मनला हे गाड़ा-गाड़ा जोहार
आवौ मिल परन करीन, संस्कृति करत हे गोहार
कोनो अनदेखना झन मेटे पावय लेबो एला पोटार


🌷सुशील भोले-9826992811

Friday, 14 July 2017

"आखर अंजोर" - पाठकीय मन्तव्य


* दिनेश चौहान
नाम से ही व्यक्ति की प्रवृत्ति का अहसास हो ऐसा अक्सर नहीं होता। पर कुछ ऐसे नाम भी होते है जो व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का परिचय देते प्रतीत होते हैं। एक ऐसा ही नाम है "सुशील भोले"। आध्यात्मिकता से ओतप्रोत व्यक्ति ही ऐसा नामधारी हो सकता है। लगता है सुशील के साथ भोलेनाथ जी स्वयं आकर विराजमान हो गए हैं। मैंने अक्सर भोजन के समय उनपर भोलेनाथ की सवारी आते देखा है। ऐसा व्यक्ति ही "आखर अंजोर" फैलाने का माध्यम हो सकता। "आखर अंजोर" के पहले भोले जी छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका "मयारू माटी" का सफल प्रकाशन भी कर चुके हैं जिसे छत्तीसगढ़ी की पहली पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन यहाँ पर हम अपना ध्यान "आखर अंजोर"पर ही केंद्रित करना चाहेंगे।

भोले जी का "आखर अंजोर" छत्तीसगढ़ के मूल धर्म और संस्कृति का लेखा-जोखा है। कुछ दिनों पूर्व माननीय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हाथों विमोचित "आखर अंजोर" को पुस्तक में द्वितीय संस्करण कहा गया है जिसे मैं "आखर अंजोर-भाग दो" कहना ज्यादा उचित समझता हूँ और संभवतः पाठक भी इससे सहमत होंगे जिन्होंने "आखर अंजोर" का प्रथम संस्करण पढ़ा है। जहाँ प्रथम संस्करण की पूरी सामग्री छत्तीसगढ़ी में थी वहीं द्वितीय संस्करण में अधिकांश लेख हिंदी में हैं। प्रायः आगामी संस्करण में पूर्व संस्करण के सभी सामग्री संशोधित रूप में मौजूद होते हैं जबकि यहाँ ऐसा नहीं है।

बहरहाल "आखर अंजोर" हमारे समक्ष ऐसे लेखों का संग्रह है जिसमें छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, पर्व, मान्यता और उच्च स्तरीय अध्यात्म के दर्शन होते हैं। संग्रह के पहले दो लेख भोलेनाथ शिव को ही समर्पित है-"शिव ही जीव समाना" और "शिवलिंग की वास्तविकता"। कबीरदास जी कह गए हैं- "ज्यूँ बिंबहिं प्रतिबिंब समाना, उदिक कुंभ बिगराना। कहै कबीर जानि भ्रम भागा, शिव ही जीव समाना।" शिव ही सबकुछ है। शिवलिंग वास्तव में क्या है? वह समस्त ब्रह्माण्ड में तेज रूप में व्याप्त परमात्मा का प्रतीक स्वरूप है। इसकी भौतिक स्वरूप में व्याख्या निरी मूर्खता और द्वेषपूर्ण प्रवंचना है।

शब्दों को हम जिस रूप में जानते समझते हैं इससे इतर यदि शब्दों के नवीन अर्थ का ज्ञान होता है तो जो खुशी मिलती है उसका अनुभव एक सुधि और गंभीर पाठक ही कर सकता है। इसीलिये तो यह "आखर अंजोर" है जो नए अर्थों को प्रकाशित कर रहा है। नर्मदा नदी का नर-मादा के रूप में विवेचना ऐसा ही प्रसंग है। कहा गया है कि मानव जीवन की उत्पत्ति छत्तीसगढ़ में हुई है। यहाँ के मूल निवासी अमरकंटक की पहाड़ी को नर-मादा अर्थात मानव जीवन के उत्पत्ति स्थल के रूप में चिह्नित करते हैं। छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति और मूल पर्व को जानना है तो इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए। मेरा दावा है मूल छत्तीसगढ़िया अपनी मौलिक पहचान को भूलकर कितने गलत मार्ग की ओर अग्रसर हो चुके हैं और अपनी मूल संस्कृति का विनाश कर रहे हैं वह शीशे के समान स्पष्ट हो जाएगा। कमरछठ को हलषष्ठी के रूप में प्रचारित करना और इसे बलराम जयंती से जोड़ना इसका एक उदाहरण है। दशहरा और होली पर्व भी अपने मूल स्वरूप से विचलित हो गया है। ऐसा प्रायः हर त्योहारों के साथ देखने को मिल जाएगा जिसमें छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति को भुलाने और आगत संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। छत्तीसगढ़ में गौरी-गौरा का विवाह कातिक अम्मावस की रात्रि में जब संपन्न हो सकता है तो देवउठनी के पहले शुभ कार्य न करने की परंपरा कहाँ से आई? मड़ई-मेला छत्तीसगढ़ की पहचान हुआ करती थी जो कि अब विलुप्ति के कगार पर है। लेखक का कहना है कि जब संस्कृति ही नहीं बचेगी तो समाज कहाँ बचेगा। छत्तीसगढ़िया कोन...? के संबंध में लेखक का स्पष्ट मत है- "जो छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जीता है वही छत्तीसगढ़िया है।" आज इसी संस्कृति को विनष्ट करने चौतरफा हमला हो रहा है जिससे लेखक का व्यथित होना स्वाभाविक है। लेखक कूपमण्डूक होने का संदेश भी नहीं देता, वो तो कहता है- "दुनिया का कोई ग्रंथ न तो पूर्ण है न पूर्ण सत्य। इसलिए ज्ञान और आशीर्वाद जहाँ से भी मिले उसे अवश्य ग्रहण करना चाहिए पर शर्त यह है कि अपनी अस्मिता की अक्षुण्णता कायम रहे।"

"सुशील भोले के गुन लेवव ये आय मोती बानी,
सार-सार म सबो सार हे, नोहय कथा-कहानी।
कहाँ भटकथस पोथी-पतरा अउ जंगल-झाड़ी,
बस अतके ल गांठ बांध ले, सिरतो बनहू ज्ञानी।।"

-दिनेश चौहान
छत्तीसगढ़ी ठीहा, शीतला पारा,
नवापारा-राजिम।
नया मो.न. 9111528286

Monday, 10 July 2017

मेरा नया ठिकाना... 'पशुपति आश्रम'






छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति और अस्मिता को लेकर अभी तक मैं जो भी लिखता-पढ़ता रहा, उसे जमीन पर स्थापित करने के लिए एक स्वतंत्र आध्यात्मिक स्थल की आवश्यकता महसूस हो रही थी, जहाँ से इसे मिशन के रूप में चलाया जा सके।

राजधानी रायपुर से बिलासपुर मार्ग पर स्थित औद्योगिक क्षेत्र के ग्राम सिलतरा में ग्राम के पूर्व जमींदार स्व. दाऊ झाड़ूराम वर्मा जी द्वारा निर्मित 'पशुपति आश्रम' उनके सुपुत्र श्री बसंत वर्मा जी एवं प्रपौत्र श्रीराम वर्मा जी के माध्यम से अपना मिशन पूर्ण करने के लिए प्राप्त हो गया है।

देखिए, उक्त स्थल का चित्र.... अब यही स्थल मेरा नया ठिकाना और कार्य स्थल होगा।

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684  

Wednesday, 5 July 2017

धरम के मारग अइसे नइहे...

धरम के मारग अइसे नइहे के बस जोगड़ा हो जावन
बनके बोझा समाज ऊपर बस मांग-मांग के खावन
ये तो कोनो धरम नइ होइस न आदर्श असन जीवन
जेला कहिथन भगवान हम उंकर जीवन अपनावन


* सुशील भोले 9826992811


Tuesday, 27 June 2017

कर के साज-संवांगा बेटी....

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना

































कर के साज-संवांगा बेटी देख होगे हे तइयार
अरे मंदरिहा ताल बजा, झन कर रे मुंधियार
हमर संस्कृति के निसदिन होही तभे बढ़वार
नवा पीढ़ी जब अगुवा बनके आही खेवनहार

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Wednesday, 14 June 2017

"आखर अंजोर" विमोचित...




छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर सुशील भोले द्वारा लिखे गये आलेखों का संकलन "आखर अंजोर" का 12 जून को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के हाथों विमोचन हुआ। राजधानी रायपुर के सिविल लाईन स्थित मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित विमोचन कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ बीज विकास निगम के अध्यक्ष श्री श्याम बैस, वरिष्ट शिक्षाविद् डा. सुखदेव राम साहू, समाजसेवी रामशरण कश्यप एवं पत्रकार भूपेन्द्र वर्मा सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। लेखक सुशील भोले ने सभी आमंत्रित अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ के मूल धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करने का आव्हान किया है।

Saturday, 10 June 2017

चंदा उसका नाम सखी रे ...





















खामोशी में नयन-शब्द से जो मन की बातें करती है
चंदा उसका नाम सखी रे, हृदय-कमल में रहती है..

चंचल-चपल मृगनयनी सी, प्रेमावन की है बाला
अपने अधरों से ही पिलाती, मादक प्रेम का जो हाला
मेरे गीतों में राग सुहानी, सरगम बन वह झरती है...

दूर देश की है वह पंछी, मन-बगिया में खेल रही
विरह-वेदना की ज्वाला को, जो बरसों से झेल रही
फिर आलिंगन में आने से, नाहक काहे वो डरती है...

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

लइका मनला नान्हे पन ले ...













लइका मनला नान्हे पन ले पूजा-पाठ संग जोरव
देव-कृपा के निरमल लहरा म सुघ्घर बने बोरव
खुलथे रद्दा एकरेच ले जम्मो बढ़वार के संगवारी
ज्ञान-संस्कार पाए के पाछू तब महकाहीं फुलवारी

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Friday, 2 June 2017

तोर हमर संगी कइसे जुरही मितानी...
















तोर हमर संगी अब तो कइसे जुरही मीत-मितानी
हम करथन आरुग ज्ञान-गोठ, तैं गढ़थस कहानी
परबुधिया नइ रहिन अब लोगन पढ़ बनगे हें ज्ञानी
हंस बरोबर अलगिया देथें इन तो सिरतो दूध-पानी

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

Tuesday, 9 May 2017

"आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ...

छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर मेरे द्वारा लिखे गए आलेखों का संकलन "आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ...

विश्वास है, यह संकलन यहां के मूल धर्म और संस्कृति पर अपने नाम के अनुरूप "अक्षर का प्रकाश " फैलाएगा...

"आखर अंजोर " के आवरण पर अंकित चित्र तेज रूप में संपूर्ण ब्रम्हाण्ड में व्याप्त परमात्मा का प्रतीक स्वरूप है। साधना काल में साधक को  ध्यानावस्था मेंं वह "काले रंग का अर्द्ध र्गोलाकार" दिखाई देता है। उसका ऊपरी आवरण "हल्का सा लालिमा" लिए हुए रहता है। हमारी संस्कृति में शिव लिंग को "काला अर्द्ध गोलाकार" बनाने की जो परंपरा है, उसका मूल कारण यही है।

Sunday, 7 May 2017

शिव लिंग की वास्तविकता....



आध्यात्मिक जगत में बहुत से ऐसे बहुरूपिए और षडयंत्रकारी लोग भी आते रहे हैं, जिनके कारण इसका वास्तविक स्वरूप और मूल दर्शन भ्रमित होता रहा है। कई मनगढ़ंत किस्सा-कहानी और मूर्खता की पराकाष्ठा को लांघ जाने वाली परंपरा भी इन सबके चलते हमारे बीच स्थान बनाने में सफल रही हैं। शिव लिंग के संबंध में ऐसे अनेक कहानी और तर्क-वितर्क भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

 साधना काल से पूर्व और अब भी यदा-कदा ऐसे बेहुदा प्रसंग मेरे समक्ष निर्मित हो जाते हैं। आश्चर्य होता है, लोग ऐसी असभ्य बातें कितनी आसानी से कह जाते हैं। जब शिव लिंग को पुरूष प्रतीक और जलहरी को स्त्री (या पार्वती) प्रतीक के रूप में चिन्हित कर उसे अश्लील रूप दिया जाता है, और लोगों को इसकी पूजा से विलग रहने की समझाइश दी जाती है।

 निश्चित रूप से ऐसे लोग शिव लिंग की वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हैं। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है, कुछ अन्य पंथावलंबी ऐसी घृणित कहानियाँ गढ़ शिव जी को छोटा बताकर अपने ईष्ट को बड़ा या श्रेष्ठ बताने की कोशिश करते हैं।

 वास्तव में शिव लिंग सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में तेज रूप में व्याप्त परमात्मा का प्रतीक स्वरूप है। हमें साधना काल में इसका बोध होता है। ध्यानावस्था में बैठा साधक जब उच्चावस्था को प्राप्त करता है, तब उसकी दिव्य दृष्टि जागृत होने लगती है। इसी अवस्था में उसे अपने चारों ओर तेज स्वरूप में व्याप्त परमात्मा अद्र्ध गोलाकार के रूप में दिखाई देने लगते हैं। यह अर्द्ध गोलाकार लगभग काला (कभी गाढ़ा बैगनी) रंग का दिखाई देता है। उसका ऊपरी आवरण (परत) हल्का सा लालिमा लिए हुए दिखाई देता है। हमारी संस्कृति में शिव लिंग को अर्द्ध गोलाकार निर्मित करने की परंपरा भी शायद इसी के चलते है, कि सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में तेज रूप में व्याप्त परमात्मा साधक को उच्चवस्था प्राप्त करने पर वैसा ही दिखाई देते हैं।

 मित्रों, मैं हमेशा यहाँ के आध्यत्मिक दर्शन को पुनर्लेखन और संशोधन की बात करता हूं, तो उसका मूल कारण ऐसे ही कुतर्क भरे किस्सा कहानियों के जंजाल से मुक्त होने के लिए ही कहता हूं। आइए, इस देश के मूल धर्म को उसके मूल रूप में पुनर्धारण करें। सर्वव्यापी परमात्मा को उसके मूल प्रतीक (लिंग) रूप में स्वीकार करें।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 79747-25684

आखर अंजोर...कव्हर...



पांव फिसल तो जाही रे...

















सम्हल-सम्हल के रेंगबे बइहा पांव फिसल तो जाही रे
फेर झन कहिबे ठोकर खाके बताये नहीं कुछु-कांही रे....

ये दुनिया तो निच्चट बिच्छल जब देख पांव फिसलथे
आगू बढ़त देख के कतकों, गोड़ ल धर के तीरथें
पग-पग डबरा-खंचका इहां कब कोन मेर धंस जाही रे...

अपन-बिरान के दिखय नहीं अब ककरो चेहरा ले भेद
थोरको भरम होही ककरो बर त वोला देबे बिल्कुल खेद
बनके अपन नइते बैरी ह, पीठ म छूरा धंसवाही रे...

जब तैं सम्हल जाबे त सुन दूसर ल घलो सम्हाल लेबे
हर जीव ल सांस लिए बर, सुख के पल दू पल देबे
इही धरम के मूल भाव ये, नइ मानही ते पछताही रे...

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. 98269-92811, 79747-25684

Thursday, 4 May 2017

भगवान पाए बर नइ लागय ...

भगवान पाए बर नइ लागय हजार ग्रंथ ल पढ़ना
बस करना परथे वोकरे सहीं अपन जिनगी गढ़ना
कर्महीन मनखे मन तो बस लपराही गोठ करथें
एकरे सेती रंग-रंग के बस उन किस्सा ल गढ़थें

सुशील भोले 
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो.नं. 98269-92811, 79747-25684

Tuesday, 2 May 2017

मुक्ति मिलही तभे जब ...

मुक्ति मिलही तभे जब कर्म के भरही हंडा
कर्म-दोष ले बाचस नहीं चाहे खवाले पंडा
ये तो भरम ये के मिलही सरग म आसन
देख लेबे तोला ठउका यमराज ठठाही डंडा

सुशील भोले 
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो.नं. 98269-92811

Monday, 1 May 2017

चिटिक खेत अउ भर्री नहीं...








चिटिक खेत अउ भर्री नहीं, हमला सफ्फो खार चाही
हमर हाथ हे जबड़ कमइया, धरती सरी चतवार चाही...
हमर पेट ह पोचवा हे अउ, तोर कोठी म धान सरत हे
हमरे खातिर तोर गाल ह, बोइर कस बम लाल होवत हे
गाय-गरु कस पसिया नहीं, अब लेवना के लगवार चाही....
तन बर फरिया-चेंदरी नहीं, अउ तैं कहिथस जाड़ भागगे
घर म भूरीभांग नहीं तब, सुख के कइसे उमर बाढग़े
चिरहा कमरा अउ खुमरी नहीं, अब सेटर के भरमार चाही...
ठाढ़ चिरागे दूनों पांव ह, जरत मंझनिया के सेती
हमर देंह ह होगे हे का, कइसे रे तोरेच पुरती
अब बेंवई परत ले साहन नहीं, हमला सुख-सत्कार चाही...
सुन-सुन बोली कान पिरागे, आश्वासन के धार बोहागे
घुड़ुर-घाडऱ लबरा बादर कस, अब तो तोरो दिन सिरागे
हमला आंसू कस बूंद नहीं, अब महानदी कस धार चाही....
सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811

देशबंधु में.. नंदिया कसआगू बढ़व..

दैनिक देशबंधु के 30 अप्रेल के अंक में.. नंदिया कसआगू बढ़व..

Friday, 28 April 2017

पेचका गाल.. तभो चूंदी रंगे हे करिया...




















पेचका-पेचका गाल होगे तभो चूंदी रंगे हे करिया
डोकरा के सउंख चघे हे, घंस-घंस होथे गोरिया
देखबे ते भइंसा पिला कस दिखत हे वोकर देंह
तभो ले खोजत हे रोजे चिक्कन-चांदन बुढ़िया

सुशील भोले
मो. 9826992811

Thursday, 27 April 2017

अक्ति - कृषि का नव वर्ष...



छत्तीसगढ़ में जो अक्ति (अक्षय तृतीया) का पर्व मनाया जाता है, उसे कृषि के नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। पुतरा-पुतरी के बिहाव या उस विवाह के लिए शुभमुहुर्त जैसी बातें तो उसका एक अंग मात्र है। हमारे यहां इस दिन किसान अपने-अपने खेतों में नई फसल के लिए बीजारोपण की शुरूआत करते हैं। इसे यहां की भाषा में मूठ धरना कहा जाता है।

 इसके लिए गांव के सभी किसान अपने यहां से धान का बीज लेकर एक स्थान पर एकत्रित होते हैं, जहां गांव का बैगा उन सभी बीजों को मिलाकर मंत्र के द्वारा अभिमंत्रित करता है, फिर उस अभिमंत्रित बीज को सभी किसानों में अापस में बांट दिया जाता है। कृषक इसी बीज को लेकर अपने-अपने खेतों में ले जाकर उसकी बुआई करते हैं।

जिन गांवों में बैगा द्वारा बीज अभिमंत्रित करने की परेपरा नहीं है, वहां कृषक अपने बीज को कुल देवता, ग्राम देवता आदि को समर्पित करने के पश्चात बचे हुए बीज को अपने खेत में बो देता है। इस दिन कृषि या पौनी-पसारी से संबंधित कामगारों की नई  नियुक्ति भी की जाती है।


अक्ति आगे घाम ठठागे चलव जी मूठ धरबो
हमर किसानी के शुरुवात सुम्मत ले सब करबो
बइगा बबा पूजा करके पहिली सबला सिरजाही
फेर पाछू हम ओरी-ओरी बिजहा ल ओरियाबो

* सुशील भोले 
मो. 98269-92811

Tuesday, 25 April 2017

बस्तर के माटी लाल होगे...












न्याय हमर बर काल होगे, बस्तर के माटी लाल होगे
जतका मुखिया-अगुवा हवंय सब सत्ता के दलाल होगें
रोज मरत हे मानवता, जिहां धरे रूप विकराल होगे
रक्षक के खाल ओढ़े भेंड़िया अब नरभक्षी के गाल होगे

माओवाद मुर्दाबाद... .. वीर जवानों को सलाम..

-सुशील भोले
9826992811

Thursday, 20 April 2017

कहूं नहाले...


धरती के नवा सिंगार आय नवा बछर

भारतीय नववर्ष माने चैत महीना के अंजोरी पाख के पहिली तिथि। मोला लागथे, हमर पुरखा मन प्रकृति के नवा सिंगार ल ही आधार मान के ए तिथि ल जोंगिन होहीं। काबर ते इही बखत प्रकृति ह पतझड़ के पाछू नवा सिंगार करथे। जम्मो रूख-राई म नवा-नवा कोंवर पान बड़ मयारुक दिखथे। हरर-हरर झांझ के बड़ोरा चारोंखुंट नाचे-कूदे ले धर ले रहिथे, तभो ले उल्हवा पान के छांव जम्मो जीव-जंत मनला अपन कोरा म बिसराम देथे, दुलार करथे।

हमर संस्कृति म परमात्मा के संगे-संग प्रकृति के घलो पूजा होथे। रूख-राई, तरिया-नंदिया, डोंगरी-पहाड़, धरती-अगास, सुरूज-चंदा सबो के। ए बहुत अच्छा बात आय काबर ते अइसन दृष्टिकोण ले, अइसन जम्मो जिनिस ल माने अउ जाने के बोध होथे, सबके सम्मान अउ संरक्षण के भाव जागथे, परमात्मा के हर कृति ल वोकरे रूप माने के सोच उपजथे।  हमर इहां बहुदेव पूजा के रिवाज हे, इहू हर इही सोच के उपज आय। अइसन किसम के बात मनखे के मन म सबला अपन माने के भाव पैदा करथे। जबकि केवल एके देवता ल माने, जाने अउ पूजे के उपदेश ले लोगन म संकीर्णता के सोच उपजथे। अपन ईष्टदेव के छोड़ दूसर बर मन म ईरखा भाव पैदा होथे। अउ फेर जेकर मन म दूसर के ईष्ट खातिर ईरखा भाव पैदा होगे, त फेर वो मनखे दुनिया म कोनो काम के नइ रहि जाय।

आज दुनिया भर म धर्म अउ वोकर ले संबंधित उपदेश या नियम-कायदा के नाम म जेन मार-काट अउ खून-खराबा देखे जावत हे, सब अइसने एके देवता के नाम म कुंठित होए लोगन मन के सेती आय। हमर इहां कोनो भी देवी-देवता के पूजा के पहिली गौरी-गणेश के पूजा के विधान हे, इहू ह इही बात के संदेश देथे के सिरिफ एके झन के पूजा नहीं भलुक संग म मातृशक्ति अउ गणशक्ति के घलोक पूजा करव तब जाके पितृशक्ति के पूजा ह पूरा होही।

चैत नवरात ले नवा बछर के शुरूवात माने के आध्यात्कि कारण घलोक हे। हमर इहां जतका भी धर्म ग्रंथ हे, जम्मो म सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के तिथि इही ल माने गे हे। साधना काल म घलो ए बात के ज्ञान करवाए जाथे। साधना के अंतर्गत जतका नवा काम होथे, सब इहें ले चालू होथे। देवारी माने के बाद कोनो भी नवा कारज के भूमिका बने ले धर लेथे, फेर चालू होथे वो ह चैत नवरात ले ही। इहां इहू जानना जरूरी हे के हमर देव मंडल ह एकरे आधार म चलथे। माने भारतीय गणना अउ पद्धति के मुताबिक, संग म चंद्रमा के घट-बढ़ के आधार म तिथि के निर्धारण के अनुसार ही अपन-अपन तिथि म अपन विशेष उपस्थिति के अनुभव कराथें।

नवा बछर अउ नवरात के चरचा होवत हे, त महतारी के घलोक नवा अउ जुन्ना आगमन के चरचा होना चाही। हमर इहां नवरात माने माता के उपासना के परब साल म दू बेर काबर मनाए जाथे? सब देवता के तो साल म सिरिफ एके बार परब मनाये जाथे, फेर माता के साल म दू पइत परब आथे। एकर असल कारण ये आय के माता के दू अलग-अलग बार मानव रूप म प्रागट्य होए हे। पहिली बार उन सती के रूप म राजा दक्ष के घर अवतरे रिहिन हें, बाद म पार्वती के रूप म राजा हिमालय के इहां। एकरे सेती माता के उपासना के परब ल साल म दू बेर मनाए जाथे। सती के रूप म उन चैत महीना म अउ पार्वती के रूप म कुंवार महीना म अवतरे रिहिन हें।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
(टिकरापारा) रायपुर (छ. ग.)-492001
मो. 98269 92811, 79747 25684

जब सावन के सुरसुरी फूटथे...

सावन के सुरता आते मन म उमंग के सुरसुरी फूट परथे। प्रकृति के जवानी चारों खुंट जब लहलहाथे तब मनखे के रूआं-रूआं कुलके अउ हुलसे लागथे। इही हुलसना अउ कुलकना ह हमर संस्कृति के साज बन जाथे, सिंगार बन जाथे। भारत भुइयां के मूल संस्कृति म सावन महीना के बड़ महात्तम हे। ये महीना ल शिव उपासना के महीना घलो कहे जाथे। सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के बाद देवता मन के अरजी करे ले परमात्मा ह इही महीना के पुन्नी तिथि म अपन पूजा के प्रतीक के रूप म तेज रूप म सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड म संचरे विराट रूप के प्रतीक स्वरूप शिव लिंग के प्रादुर्भाव करे रहिसे। इही महीना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि म वोकर सबले प्रमुख गण, जे हमेशा वोकर गला म आसन पाथे, वो नांग देवता के घलो जमन होए हे, जेकर सेती हमन नाग पंचमी के रूप म उंकर सुरता अउ पूजा करथन।

परमात्मा के एक रूप प्रकृति ल घलो माने जाथे, अउ प्रकृति के अद्भुत रूप, सिंगार घलो ह ए सावन म देखने-देखन भाथे। ए महीना म झड़ी-बादर, तरिया-नंदिया के घलोक अइसन रूप होथे के मनखे मन एती-वोती जवई ल छोड़ के एके तीर बइठ के पूजा उपासना के मुद्रा म आ जथें। माने हर दृष्टि ले सावन परमात्मा के उपासना खातिर उपयुक्त लागथे। बोल बम के जयकारा पूरा महीना भर सुने ल मिलथे। जेती देखौ साधक रूप के सिंगार करे कांवरिया मन अपन-अपन क्षेत्र के पवित्र नंदिया-नरवा के जल लेके अपन-अपन क्षेत्र के सिद्ध शिव स्थल म जाके वोला समर्पित करथें। अध्यात्म म परमात्मा ल पाए के तीन रस्ता बताए गे हे- ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग अउ साधना मार्ग। सावन म ये तीनों रस्ता या मार्ग एके संग देखे ले मिलथे।

शिव के प्रमुख गण नागदेव के प्रादुर्भाव इही सावन के अंजोरी पंचमी म खुद भोलेनाथ अपन दाहिना हाथ ले करे रिहिसे। मोर साधना काल म एक ठन बिरबिट करिया शेषनांग हमेशा मोर जगा आवय अउ मोला लपेट डारय। शुरू-शुरू म अड़बड़ डर लागय। मैं वोला फुहर-फुहर के गारी देवौं, पटकिक-पटका होवौं, लड़ौं-झगरौं। धीरे-धीरे मोर अंदर के डर ह कम होए लागिस, त वोकर संग मजा लेए लागेंव। वो समय मोला बताए गिस के संपूर्ण सर्प प्रजाति के उत्पत्ति भोलेनाथ के दाहिना हाथ ले होए हे। वोकरे सेती वोहर एकर जम्मो काम म जेवनी या कहिन दांया हाथ के भूमिका निभाथे। जिहां कहूं शिव उपासना होथे, वोकर मदद खातिर सबले पहिली इही जाथे। शेषनाग के सिरिफ पांच फन होथे, इहू बात ह जाने के लाइक हे। ये पांचों फन ह भोलेनाथ के दाहिना हाथ के पांचों अंगरी के प्रतीक आय। शेषनाग के संबंध म जेन सैकड़ों-हजारों फन के कथा मिलछे वो मनगढ़ंत अउ अतिशयोक्ति आय।

सावन पुन्नी के दिन जेन रक्षा बंधन के तिहार मनाए जाथे वोहर सिरिफ भाई-बहिनी के रक्षा के तिहार नोहय, भलुक जम्मो जीव-जगत के रक्षा परब आय। काबर ते परमात्मा इही दिन अपन पूजा के प्रतीक देके जम्मो झन के सुरक्षा अउ सुख-शांति के आशीष अउ वचन दिए रिहिन हें। इहां ये जानना जररूरी हे, के उपासना के फल हर उपासक ल मिलथे। एकर प्रक्रिया अंजोरी-अंधियारी पाख के आधार म मिलथे। अंधियारी पाख म हमर रद्दा म जेन अवरोधक तत्व होथे, वोला हटाए के बुता होथे, अउ अंजोरी पाख म फेर वो फल जेकर उपासना खातिर साधना करे जाथे वो ह मिलथे। ए सब ह एके दिन या महीना म नइ मिल जाय, जइसे-जइसे कारज होथे, वोकर मुताबिक वतका दिन तक धैर्य रखे के जरूरत होथे।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
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Wednesday, 19 April 2017

तब कोरा भरथे अन्नपुरना के

भादो के गहिर बरसा ल अन्नपुरना के गरभ भरे के प्रतीक-महीना माने जाथे। जतका जादा अउ बेरा-बखत म बरसा होथे, अन्न के मोट्ठई अउ पोट्ठई वोकरे अनुसार सुघ्घर अउ गुत्तुर होथे।  एकरे सेती हमर इहां पोरा तिहार के दिन धान के गरभ भरे के प्रतीक स्वरूप 'पोठरी पान" के संस्कार मनाए जाथे। जम्मो किसान पोरा म रोटी-पीठा जोर के अपन-अपन खेत म लेग के राखथें। जइसे नवा बहुरिया ल पहिलावत लइका बखत 'सधौरी" खवाए के नेंग करे जाथे न, बस वइसने अन्नपुरना ल घलो 'पोठरी पान" खातिर 'सधौरी" के रूप म रोटी-पीठा अर्पित करे जाथे। हमर धरम-संस्कृति के जम्मो रीत-नीत अउ गीत ह प्रकृति के ये गुन ल अपन अंचरा म संवांगा करथे।

भादो के जतका महत्व आम जीवन म हे, वतके अध्यात्म घलो हे। हमर इहां के आदि धर्म म ए महीना ल शिव पार्षद मन के प्रादुर्भाव के महीना माने जाथे। भगवान भोलेनाथ के तीन प्रमुख गण के जनम इही महीना म होए हे, संग म माता पार्वती के द्वारा भोलेनाथ ल पति रूप म पाए खातिर करे गे कठोर तपस्या केे प्रतीक स्वरूप 'तीजा" के परब घलोक इहीच महीना म आथे। जइसे शिव उपासना खातिर सावन के महीना के महत्व हे, वइसने वोकर गण-पार्षद मन के उपासना खातिर भादो के महत्व हे। ए भादो के अंधियार पाख के छठ तिथि म स्वामी कार्तिकेय के जनम होए हे, जेला हम 'कमरछठ" के रूप म जानथन। अमावस्या के पोरा के रूप म जेन परब मनाथन वो शिव सवारी नंदीश्वर के जनम तिथि आय, अउ अंजोरी पाख के चतुर्थी तिथि गणनायक गणेश के उत्पत्ति या निरमान होए के तिथि आय।

'कमरछठ" असली म संस्कृत भाखा के 'कुमार षष्ठ" के छत्तीसगढ़ी अपभ्रंश रूप आय। देव मंडल म सिरिफ शिव पुत्र कार्तिकेय ल ही कुमार कहे जाथे, जे हर देव मंडल के सेनापति के घलोक भूमिका निभाथे। एकरे सेती जब भी अंजोरी-अंधियारी वाला पक्ष परिवर्तन होथे त वोकर प्रभाव ह छठ तिथि ले ही परिवर्तित होथे। (ए बात ल सिरिफ साधना-मार्ग के साधक मन ही अनुभव कर पाहीं, सामान्य जीवन जीने वाला मन नहीं। ) हमर इहां एकरे सेती कमरछठ परब म महतारी मन उपास रहि के शिव-पार्वती के पूजा करथें अउ अपन-अपन लोग-लइका मन के सुरक्षा के साथ कार्तिकेय जइसे ही श्रेष्ठ अउ योग्य जीवन के कामना करथें। आजकल 'कमरछठ" ल 'हलषष्ठी" के रूप म बलराम जयंती के नांव म प्रचारित करके हमर संस्कृति के मूल रूप ल भ्रमित करे जावत हे। ए ह बने बात नोहय।

भादो अमावस्या के हमर इहां जेन पोरा के परब मनाए जाथे वो ह शिव-सवारी नंदीश्वर के जन्मोत्सव आय।  हमर इहां एकरे सेती ए दिन नंदिया बइला ल बने सम्हरा के पूजा करे जाथे। हमर संस्कृति म मुख्य देवता के संगे-संग उंकर गण-पार्षद मन के घलोक पूजा होथे, इहू एक अच्छा परंपरा आय। ए दिन लइका मनला माटी के बने बइला ल दंउड़ावत देखबे त बड़ा निक लागथे। लोगन बइला दउड़ के प्रतियोगिता घलोक करथें।

अंजोरी पाख के चतुर्थी तिथि म जब गणपति बाबू दस दिन बर सजे-धजे पंडाल मन म बिराजथे, त बड़ा आनंद आथे। चारोंमुड़ा रिंगी-चिंगी, मेला-मड़ई, नाचा-गम्मत, हल्ला-गुल्ला, पोंगा-बाजा, चिहुर मात जाथे। गणपति ल गणनायक सिरिफ एकरे सेती कहे जाथे, के वोहर बुद्धि म बड़ा तेज रिहिसे, तेकरे सेती वोला जम्मो गण मन के मुखिया के पद दे गइस। समाज संचालन म अइसन बात मनला सुरता करे जाना चाही। फेर आज उल्टा होवत हे, पद अउ पइसा ह योग्यता के मापदंड बनगे हवय। जे मनखे मनला अपन कला-संस्कृति, भाषा-अस्मिता अउ ऐतिहासिक गौरव के ज्ञान अउ गरिमा नइ राहय, तेकर मन के हाथ म समाज के नेतृत्व सौंपे जाना बहुते नुकसान के बात आय।

गणेश चतुर्थी के एक दिन पहिली माने अंजोरी पाख के तीसरा तिथि के हमर महतारी मन अपन-अपन पति के सुरक्षा अउ अखण्ड सौभाग्य खातिर कठोर उपास के माध्यम ले तीजा के परब ल पूरा करथें। 'तीजा" माता पार्वती द्वारा भोलेनाथ ल पति रूप म पाए खातिर करे गे कठोर तपस्या के प्रतीक स्वरूप मनाए जाने वाला परब आय। हमर छत्तीसगढ़ म एक बहुते सुंदर रिवाज हे। ए तीजा परब ल पूरा करे खातिर महतारी मन अपन-अपन मइके जाके एला पूरा करथें। अलस म पार्वती जब कुंवारी रिहिसे तब ये तप ल करे रिहिसे। कुंवारी पन माने माता-पिता के घर म रहना, एकरे सेती ये तीजा के परब ल हमर इहां के महतारी मन अपन पिता के घर जाके ए परब पूरा करथें। ए परब ल कुंवारी नोनी मनला घलोक करना चाही, काबर के पार्वती तो कुंवारीच पन म एला करे रिहिसे।

तीजा के महत्व ह सिरिफ पति पाए या उंकर उमर बढ़ाए भर के परब नोहय। असल म मइके जाये के उत्साह, वोमन म जादा देखे बर मिलथे। बर-बहाव के बाद नारी-परानी मनला ससुरार म जिनगी पहाना होथे। बचपन के संगी-सहेली, हित-पिरित, भइया-भउजी, दाई-ददा के दुलार अउ गोठ ह नोहर कस हो जाथे। तीजा म जम्मो झन संग भेंट हो जाथे, एकरे सेती भोभली डोकरी हो जाय रहिथे, तेनो मन ह मइके ले तीजहार आए के रद्दा देखत रहिथे।

अतेक सुंदर भावना ले भरे संस्कृति ल तो पूरा दुनिया म बगरना चाही। खास करके अइसन समाज जेन बेटी ल बोझा मान के कोंख म ही मरवाए के उदिम करत रहिथे। अइसन लोगन मनला छत्तीसगढ़ के ये महान संस्कृति ले शिक्षा लेना चाही, एला आत्मसात करे जाना चाही।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
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कृषि कवि सम्मेलन...



 कृषि विषय पर आधारित कवि सम्मेलन का आयोजन पहली बार डा. गजेन्द्र चंद्राकर के संयोजन में कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर के सभागार  में किया गय़ा. 17 अप्रेल 2017 को आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कुलपति जी थे। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवियों मीर अली मीर, सुशील भोले, कृष्ण कुमार भारती, ऋषि कुमार वर्मा एवं चोवा राम बादल ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

शक्ति संग ज्ञान के अंजोर बगरय

चम्मास के गहिर बरसा के थोर सुरताए के पाछू जब हरियर धनहा म नवा-नेवरनीन कस ठाढ़े धान के गरभ ले नान-नान सोनहा फुल्ली कस अन्नपुरना के लरी किसान के उमंग संग झूमे लगथे, तब जगत जननी के परब नवरात के रूप म घर-घर, पारा-पारा, बस्ती-बस्ती म जगमग जोत संग उजराए लागथे।

नवरात माने शक्ति के उपासना परब। शक्ति जे भक्ति ले मिलथे। छत्तीसगढ़ आदिकाल ले भक्ति के माध्यम ले शक्ति के उपासना करत चले आवत हे, फेर लगथे के महतारी के सरबस किरपा वोकर लइका मन ऊपर छाहित नइ हो पावत हे। एकरे सेती कहूं न कहूं मेर थोक-मोक चिरहा, फटहा अउ उघरा रहि जाथे। तभे तो इहां के भोला-भाला मूल निवासी ाज तक तन ल पूरा ढांके के जतन नइ कर पाए हें। ये सपना ल पूरा करे के अकाट कारज के रूप म अलग राज के निरमान खातिर खून-पसीना एकमई करीन, फेर लागथे अलग राज बने के बात ह सिरिफ कागज के लिखना बन के रहिगे हे। एक अलग नक्शा के चिन्हारी भर बनके रहिगे हे।

जेन समस्या के निवारन खातिर दिन-रात एक करीन, भूख-पियास संग मितानी बदिन, ओही समस्या बेसरम के जंगल-झाड़ी कस बिन लगाए अपने-अपन बाढ़त जावत हे। इहां के मूल निवासी मन के हाथ म लोकतांत्रिक सत्ता सौंपे के सपना लरी-लरी हो जावत हे। जेन बाहिरी कहे जाने वाले मनखे मन के नांग-फांस ले मुक्ति खातिर आजादी के बीन बजाए गेइस, लागथे वो अकारथ होवत जात हे। वोकर मन के षडयंत्र दिनों-दिन बिन जड़ के अमरबेल अस चारोंमुड़ा छछलत जावत हे।

आज राष्ट्रीयता के मापडदण्ड क्षेत्रीय उपेक्षा अउ छलावा के के नेंव ऊपर खड़े नजर आवत हे। लागथे ये राष्ट्रीयता के परिभाषा ल नवा रूप अउ नवा ढंग संग फिर से परिभाषित करे के बेरा आगे हे। राष्ट्रीयता के नांव म सिरिफ क्षेत्रीय उपेक्षा होवत हे। चाहे वो भाषा के बात हो, संस्कृति के बात हो, रीति-रिवाज या परब-तिहार के बात हो, चाहे लोकतांत्रिक सत्तअउ शासन म भागीदारी के बात हो,। जम्मो डहार स्थानीय पहचान ल समाप्त करे के उदिम रचे जावत हे। अउ अइसन तब तक होवत रइही जब तक इहां के असली अस्मिता प्रेमी मूल निवासी (सत्ता, समाज या साहित्य के दलाल नहीं) के हाथ म सम्पूर्ण सत्ता नइ आ जाही।

मूल नवासी संबंध म घलोक सरकारी दृष्टिकोण अउ मापदण्ड ल बदलना परही। सिरिफ कुछ बरस इहां रहि जाये या जनम भर ले ले म कोनो मूल निवासी नइ हो सकय। जब तक इहां के अस्मिता ल, इहां के संस्कृति ल आत्मसात नइ कर लेवय, तब तक कोनो इहां के मूल निवासी नइ हो सकय। जे मन सौ-पचास साल ले इहां अपन पूरा परिवार सहित राहत हें, फेर आज तक उन अपन संग अपन मूल प्रदेश ले लाने भाषा-संस्कृति ल जीयत हें वोला निश्चित रूप ले बाहिरी ही माने जाही।

ये बछर के उपासना के परब म महतारी ले अरजी हे, वो लोगन ल सद्बुद्धि देवय। उनला बतावय के राम राज के व्यवस्था ल सबले श्रेष्ठ राज व्यवस्था के रूप म उदाहरण दिए जाथे, उहू ह स्थानीय व्यक्ति के हाथ म स्थानीय शासन के रिहिसे। एकरे सेती रावन के मरे के बाद लंका के राजा विभीषण ल बनाए गेइस, अउ बाली के बाद सुग्रीव ल। राम जानत रिहिसे के दूसर के अधिकार अउ अस्मिता ऊपर दूसर मनखे ल लाद के कभू आदर्श राज के स्थापना नइ करे जा सकय।

सुशील भोले
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सुवा... गौरा-ईसरदेव बिहाव के नेवता देथे

छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के नांव म जतका भी किताब, शोध ग्रंथ या आलेख उपलब्ध हे, सबो म कातिक महीना म गाये जाने वाला सुवा नृत्य-गीत ल 'नारी-विरह" के गीत के रूप म उल्लेख करे गे हे। मोर प्रश्न हे- सुवा गीत सिरतोन म नारी विरह के गीत होतीस, त एला आने गीत मन सहीं बारों महीना काबर नइ गाये जाय? सिरिफ कातिक महीना म उहू म अंधियारी पाख बर म कुल मिला के सिरिफ पंदरा दिन भर काबर गाये जाथे? गाये जाथे इहां तक तो ठीक हे, फेर माटी के बने सुवा ल टोपली म रख के ओकर आंवर-भांवर ताली पीट-पीट के काबर नाचे जाथे? का बिरहा गीत म अउ कोनो जगा अइसन देखे या सुने बर मिलथे? अउ नइ मिलय त फेर एला नारी विरह के गीत काबर कहे जाथे? का ये हमर धरम अउ संस्कृति ल अपमानित करे के, भ्रमित करे के या वोला दूसर रूप अउ सरूप दे के चाल नोहय?

ये बात तो जरूर जान लेवौ के छत्तीसगढ़ म जतका भी पारंपरिक गीत हे, नृत्य हे सबके संबंध धर्म आधारित संस्कृति संग हे। चाहे वो फुगड़ी के गीत हो, चाहे करमा के नृत्य हो, सबके संबंध विशुद्ध अध्यात्म संग हे। हमर इहां जब भी संस्कृति के बात होथे, त वोहर सिरिफ नाचा-गम्मत या मनोरंजन के बात नइ होय, अइसन जिनिस ल हमन कला-कौशल के अंतर्गत गिनथन, संस्कृति के अंतर्गत नहीं। ये बात ल बने फोरिया के समझना जरूरी हे, संस्कृति वो होथे जेला हम जीथन, आत्मसात करथन, जबकि कला मंच आदि म प्रदर्शन करना, जनरंजन के माध्यम बनना होथे। जे मन इहां के धरम अउ संस्कृति ल कुटिर उद्योग के रूप म पोगरा डारे हें, वो मन जान लेवंय के अब इहां के मूल निवासी खुद अपन धरम, संस्कृति अउ कला वैभव ल सजाए-संवारे अउ चारों खुंट वास्तविक रूप म बगराए के बुता ल सीख-पढ़ डारे हे। अब  ए मन ल ठगे, भरमाए अउ लूटे नइ जा सकय।

सुवा गीत असल म गौरा-ईसरदेव के बिहाव के संदेशा दे के गीत आय। हमर इहां जेन कातिक अमावस के गौरा-गौरी या कहिन गौरा-ईसरदेव के पूजा या बिहाव के परब मनाए जाथे, वोकर संदेश या नेवता दे के कारज ल सुवा के माध्यम ले करे जाथे। हमर इहां कातिक नहाए के घलो रिवाज हे। मुंदरहा ले नोनी मन (कुंवारी मन जादा) नहा-धो के भगवान भोलेनाथ के बेलपत्ता, फूल, चंदन अउ धोवा चांउर ले पूजा करथें, ताकि उहू मनला उंकरे असन योग्य वर मिल सकय। अउ फेर तहां ले संझा के बेरा जम्मो झन जुरिया के सुवा नाचे बर जाथें। सुवा नाचे के बुता पूरा गांव भर चलथे, एकर बदला म वोमन ल जम्मो घर ले सेर-चांउर या पइसा-रुपिया मिलथे, जे हा अमवस्या के दिन होने वाला गौरा-ईसरदेव के बिहाव के परब ल पूरा करे के काम आथे।

कातिक अमावस के पूरा नेंग-जोंग के साथ ईसरदेव के संग गौरा के बिहाव कर दिए जाथे। इही ल हमर इहां गौरा पूजा परब घलो कहे जाथे। सुवा गीत के संबंध ह एकरे संग हे, जेन ह एक प्रकार ले नेवता या संदेश दे के काम आथे। एला अइसनो कहे जा सकथे के गौरा-ईसरदेव के बिहाव-नेवता ल माईलोगिन मन घरों-घर जाके सुवा गीत-नृत्य के माध्यम ले देथें, अउ बिहाव-भांवर म होने वाला खर्चा के व्यवस्था खातिर सेर-चांउर या रुपिया-पइसा  लेथें।

इहां इहू जाने अउ गुने के बात आय, के ये गौरा-गौरी परब ह कातिक अमावस के होथे। माने जेठउनी (देव उठनी) के दस दिन पहिली। माने हमर परंपरा म भगवान के बिहाव ह देवउठनी के दस दिन पहिली हो जाथे, त फेर वो चार महीना के चातुर्मास के व्यवस्था, सावन, भादो, कुंवार, कातिक म कोनो किसम के मांगलिक कारज या बर-बिहाव के बंधना कइसे लागू होइस? वइसे भी मैं ये बात ले सहमत नइहौं के कोनो भगवान ह चार महीना ले सूतथे या कोनो दिन, पक्ष या महीना ह कोनो शुभ कारज खातिर अशुभ होथे। हमर संस्कृति निरंतर जागृत देवता के संस्कृति आय। एकरे सेती मैं कहिथौं के हर कारज ल कोनो भी दिन करे जा सकथे। भलुक मैं तो कहिथौं के हमर संस्कृति म इही चार महीना (सावन, भादो, कुंवार, कातिक) सबले शुभ अउ पवित्र होथे, तेकर सेती जतका भी शुभ कारज हे इही चार महीना म करे जाना चाही।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
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Tuesday, 18 April 2017

साधना ले सहजता तक

साधना के नांव सुनते लोगन बहुत कठोर जीवन पद्धति के कल्पना करे लगथे। एला नइ खांव, वोला नइ खांव, इहां नइ जांव, उहां नइ जांव, अइसे नइ करंव, वइसे नइ करंव... अइसन किसम के विचार तब तक मन म किंजरत-फिरत रहिथे, जब तक हमला वास्तविक ज्ञान के चिन्हार नइ हो जाय। कोनो सत्गुरु हे, सत्य ज्ञान के चिन्हार हे, मर्मज्ञ हे, तब तो हमला वोकर ले सोज्झे रस्ता मिल जाथे, नइते जिनगी भटकाव के चकर-घिन्नी म भटकत रहिथे। सत्गुरु के एक रूप सत्साहित्य घलोक आय। कोनो सत्य के जानकार द्वारा लिखे गे ग्रंथ या किताब घलो हमला सत्य के रस्ता के चिन्हारी कराथे। सत्य पुरुष ल चिन्हे के, पाये के उपाय बताथे।

फेर इहू बात सही हे, के आज कतका अकन ग्रंथ, किताब या साहित्य ह सत्साहित्य के सीमारेखा म शामिल हो पाथे? काबर ते आज चारोंखुंट अधकचरा, अनगढ़ अउ अनभरोसी मनखे अउ किताब मन के फैलाव होगे हे।  नकली मन असली ले जादा चमचमावत अउ रोटहा दिखथें। जेन मनखे सिरिफ ऊपरे ऊपर ले चकाचक ल देख के मोहा जाथे ते मन एकर मन के चक्रव्यूह म फंस जाथें। तहां ले  मरत ले उहां ले बाहिर निकले के रस्ता खोजत सिरा जाथें, मर-खप जाथें।  आज इही नकली-चकली मन के बढ़वार जादा होगे हे, तेकर सेती सत्य के रस्ता  म  चलना, वोला पाना जादा मुसकुल होगे हे।  एकरे सेती अब सिरिफ एके जिनिस ऊपर चिन्हारी के आखिरी बरोसा बांचे रहिथे, अउ वो हे 'आत्म ज्ञानÓ के भरोसा।

सिरिफ आत्म ज्ञान के द्वारा हम असल रस्ता, असल ज्ञान, असल पहिचान अउ असल भगवान ल पा सकथन। अउ ये आत्म ज्ञान मिलथे साधना ले।  अइसन सुव्यवस्थित आध्यात्मिक जीवन पद्धति खातिर सबले श्रेष्ठ युवा अवस्था होथे। काबर ते ए बखत थोर-बहुत समझे-जाने अउ दुख-पीरा, उपास-धास ल सहे के लाइक देंह-पांव होथे, जबकि नान्हेपन पन म कोनो भी आदमी के बुद्धि कमजोर या कम विकसित होथे, त बुढ़ापा या प्रौढ़ावस्था म देंह-पांव ह उपास-धास या कोनो किसम के कठोर जीवन पद्धति ल सहे के लाइक नइ राहय। ये विशेष साधना के अवस्था ल जम्मो मनखे ल अपन जीवन काल में एक बेर जरूर पूरा करना चाही। जादा नहीं ते सात ले लेके चौदा बछर तक आत्म ज्ञान खातिर लगाना चाही। एकर ले मनखे ल हर क्षेत्र के, हर विषय के ज्ञान होही, अनुभव होही, जेकर ले कोनो भी किसम के ठग-जग करइया मन के भटकाव अउ भरमाय ले मुक्ति मिलही।

विशेष साधना काल के बाद मनखे ल फिर से सामान्य अवस्था म आके अपन पाये ज्ञान अउ अनुभव ल समाज म बांटे अउ बगराए के उदिम करना चाही। जीवन भर वो कठोर जीवन पद्धति ल धरे नइ बइठे रहना चाही। काबर ते गुरु या मार्गदर्शक जेन होथे, वोकर जीवन पद्धति ल देख-सुन के वोकर अनुयायी मन घलोक आचरण करथें, तेकर सेती जरूरी हे, अनावश्यक के कठोरता या देखावा नइ करे जाना चाही। मार्गदर्शक ल ये बात के सुरता राखना चाही के वोकर जिम्मेदारी एक आम गृहस्थ मनखे ल जम्मो सांसारिक कर्तव्य ल पूरा करत परमात्मा पाए के रस्ता म ले जाए के बुता करना घलोक होथे। इही सत्मार्ग ये, सच्चा ज्ञान ये, अउ साधना ले सहजता तक के यात्रा ये।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
(टिकरापारा) रायपुर (छ. ग.)-492001
मो. 98269 92811, 79747 25684
                                                                                                                             

पूरा नइए ग्रंथ....


डर्राए के जरूरत नइहे

परमात्मा हमर संरक्षक होथे, मार्गदर्शक होथे, हमर पालनकार पिता होथे, ऐकर सेती वोकर ले कोनो किसम के डर्राए, लजाए या संकोच करे के जरूरत नइए। हम जेकर उपासना करथन वोला अपन परिवार के एक सदस्य मान के करना चाही। वो हमर रखवार ये, हमर मुखिया ये अइसन मान के वोकर पूजा उपासना करना चाही। आज समाज म कई किसम के अइसन बात प्रचलन म देखे जाथे, जेमा लोगन ल परमात्मा के पूजा-उपासना ले भटकाए के, झझकाए के उदिम करे जाथे। खास करके इहां के पिछड़ा कहे जाने वाला  समाज मन संग जानबूझ के अइसन बात मन म डरवाए जाथे, तेमा वोमन पूजा-उपासना के रद्दा म आगू झन बढ़ सकंय। असल म ये वर्ग के लोगन ल आध्यात्मिक शक्ति ले अलगाए खातिर, शक्तिहीन बनाए खातिर अइसन किसम के षडयंत्र रचे जाथे। जबकि तथाकथित उच्च वर्ग के लोगन ल हर परिस्थिति म पूजा-उपासना करे बर प्रोत्साहित करे जाथे।

भगवान ह कोनो दुष्ट, चंडाल या बात-बात म रिसाने या गुस्सा करने वाला नइ होय, तेमा वो लोगन के छोट-मोट गलती अउ भूल-चूक म रिसा या गुस्सा जावय। उनला भगवान ए सेती कहे जाथे, के वोहर हर किसम के गलती अउ भूल-चूक ल माफी कर देथे। ओकर ले सुधार के रस्ता बताथे, अउ गलत काम के दलदल ले पार नहकाथे। उपई करे म महतारी घलो थपरा बजाथे, मुंह चलाथे, तब वो जेन धर्म रूपी न्याय के स्थापना करथे उहू हर सजा कइसे नइ दिही? फेर वो सजा ह सिरिफ सुधार खातिर होथे, या वोकर बहाना म कोई विशेष साधना पूरा करवाना या फेर कोनो गूढ़ रहस्य के बात ल समझाना होथे. तेकरे सेती अइसन कोनो भी किसम के बात या घटना ल सोच के पूजा-उपासना के रद्दा ल नइ छोडऩा चाही।

आज हमन पिछड़ा समाज के रूप म जेन लोगन मन ल देखथन, वो असल म अइसने किसम के भटकाव मन के सेती परमात्मा के रद्दा ले दुरिहा होए के सेती पिछड़े हे। चाहे वोला संस्कारगत पिछडऩा काहन, शिक्षा के माध्यम ले पिछडऩा काहन या फेर पद-पइसा के रूप म पिछडऩा काहन। सब आध्यात्मिक शक्ति ले दुरिहाए के सेती होए हे। अध्यात्म संग जुड़ाव ह हर किसम के विकास के रस्ता ल खोलथे। ज्ञान, बल, बुद्धि, आत्मवश्वास हर चीज के विकास ह पूजा-उपासना के माध्यम ले होथे, अउ इही सब चीज ह अन्य सब विकास के रस्ता म सफलता देवाथे। जेन समाज ल या लोगन ल आज हम विकसित रूप म देखथन वो सिर्फ आध्यात्मिक शक्ति के सेती आय। इहां के बहुत बड़े तबका ल अध्यात्मिक शक्ति ले काटे के जेन षडयंत्र करे गे रिहिसे वो सिरिफ ये सेती आय के एमन कभू विकास के रद्दा म आगू झन बढ़ सकंय, तेमा वोकर मन के इशारा म इन जीवन भर नाचत-कूदत राहंय।

आर्य मन ये देश म मुट्ठी भर संख्या म आइन, फेर इही षडयंत्र के सेती ये देश के बहुसंख्य लोगन ल अपन गुलाम बना डारिन। ये देश के मूल धर्म, मूल देवता अउ मूल संस्कृति ल बिगाड़े, अपमानित करे अउ वोमा जबरदस्ती अपन ठप्पा लगा के अपन कब्जा म करे के छोड़ अउ वोमन कुछू नइ करे हें। इहां के जतका भी गौरवशाली मूल संस्कृति हे, इतिहास हे, देवी-देवता हे, वो सब हमर पुरखौती आय, हमर संपत्ति आय। वो सबला हमला फिर से अपन हाथ म लेना परही। वोकर ऊपर कुंडली मार के बइठ के दुकानदारी चलावत मनखे मनला वोमा ले खेदारे ले परही। परमात्मा ककरो देंह-पांव, रूप-रंग देख के नइ मोहावय, तेमा वो वोकर मन के केहे-बोले ल मानही-सुनही। परमात्मा हर मनखे के सुख-दुख के संगवारी आय, हर मनखे वोला अपन भक्ति दुवारा प्रसन्न कर सकथे, अउ लोक कल्याण के रद्दा म रेंग के वो परमतत्व के अस्तित्व म शामिल हो सकथे।  

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ. ग.)-492001
मो. 98269 92811, 79747 25684

शक्ति चिन्हाथे मंत्र

ये देश के जतका भी पारंपरिक ज्ञान के स्रोत हे, सबला तोपे, मूंदे अउ छाबे के बुता अभी र_ मार के चलत हे। विज्ञान के नांव म हर पारंपरिक शक्ति के स्रोत ल चुनौती दिए जात हे। कभू-कभार तो लगथे, ये सबला जान-बूझ के भ्रमित करे जावत हे। काबर के विज्ञान के नांव म जेन किसम के कुतर्क करे जाथे, वोहर बौद्धिक रूप ले कभू तर्क संगत नइ लागय।

तंत्र-मंत्र ल बिना सोचे-समझे अउ जांचे-परखे अंधविश्वास काबर कह दिए जाथे? आखिर अंधविश्वास के परिभाषा आय का? बिना परीक्षण करे कोनो भी जिनिस ऊपर भरोसा करना ल ही तो अंधविश्वास कहे जाथे ना? मोर प्रश्न हे- का विज्ञान ह आज तक अइसन कोनो विधि के आविष्कार करे हे, जेकर द्वारा दैवीय शक्ति मन के मात्रा या प्रतिशत ल नापे जा सकय? नहीं त फेर दैवीय शक्ति ल मंत्र के माध्यम ले लोगन तक पहुंचाए के बुता ल अंधविश्वास कइसे कहे जावत हे?

असल म मंत्र ह माध्यम के काम करथे। जइसे बिजली के द्वारा जलने वाला बल्ब 'पॉवर हाउसÓ या बिजली उत्पादन केंद्र ले आए तार म समाए शक्ति के सम्पर्क म आथे त वो बल्ब ह जगमगा के जल जाथे। उही किसम तंत्र-मंत्र घलो म स्वतंत्र रूप ले कोनो शक्ति नइ राहय, फेर जब वो कोनो साधक द्वारा दैवीय साधना ले प्राप्त शक्ति के संपर्क म आथे, त लोककल्याण के भावना प्रेरित मनखे बर अमरित कस हो जाथे। भभूत म, ताबीज म, या माला-मुंदरी म स्वतंत्र रूप ले कोनो शक्ति नइ राहय, फेर जइसे बल्ब ह बिजली-शक्ति के सम्पर्क म आए ले जगजगा उठथे, तइसने अइसन जम्मो किसम के जिनिस ह सिद्ध साधक के सम्पर्क म आके लोक कल्याणकारी बन जाथे।

ग्रह-नक्षत्र मन के घलो अइसने अपन-अपन महत्व हे। इहू मन बेरा-बेरा म अपन अच्छा या बुरा प्रभाव ले लोगन ल अपन उपस्थिति के अनुभव करावत रहिथें। एकर मन के प्रभाव ले बांचे खातिर रत्न आदि धारण करे जाथे, वोकरो बड़ महत्व हे। फेर ये सबला सही जगा अउ सही रूप म पहिने या धारण करे जाना चाही। जइसे महंगा ले महंगा टेलीविजन ह घलो बिना एंटीना के चकचक ले साफ-सुथरा नइ दिखय, तइसने कतकों बेर कोनो ग्रह के प्रभाव ह हमन ल पूर्ण रूप ले नइ मिल पावय, तब वो ग्रह ले संबंधित रत्न हमर बर एंटिना के भूमिका निभाथे। ए रत्न मन म कई किसम के रोग-राई ठीक करे के घलोक गुण होथे।

असल म ये तंत्र-मंत्र, ज्योतिष आदि ल कोनो चमत्कार के भावना ले देखने वाला मन ठगाथें, या उनला वइसन संतुष्टि नइ मिलय जइसन उन चाहत रहिथें। अइसन किसम के ये जम्मो जिनिस मनला घलोक चिकित्सा के एक विधि माने जाना चाही, वोकर ले जादा अउ कुछू नहीं। जइसे चिकित्सा के अबड़ अकन विधि हे, तेमा के एक ठन विधि इहू आय, बस अतके। औषधि म प्राकृतिक जिनिस मन शक्ति ले रोग के प्रवृत्ति के अनुसार उपयोग करके ठीक करे जाथे, वइसने दैवीय शक्ति के माध्यम ले घलो कोनो भी किसम के तकलीफ मनला बने करे जाथे। आध्यात्मिक या कहिन दैवीय शक्ति के सबले बड़े गुन ये आय के ए हर मानसिक सुख अउ शांति के घलोक व्यवस्था करथे, जबकि औषधि मन के माध्यम ले अइसन सुख-शांति के व्यवस्था नइ करे जा सकय।

दाई-बबा मन के अनुभव के खजाना ल हमन घरेलू नुस्खा के रूप म घलोक जानथन। वइसने जड़ी-बूटी के रूप म हमर इहां आयुर्वेदिक चिकित्सा के जेन चलन हे, वो सब बहुते महत्व के हे। अपन तीर-तखार म बगरे जिनिस म कम से कम खर्चा म बड़े ले बड़े तकलीफ के निदान हो जाथे। मोला लागथे, ए देश के अइसन जम्मो पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के उही मन बुराई करथें या वोकर संबंध म अफवाह फैलाथें, जे मन दवाई माफिया के षडयंत्र जाल म उलझे या फंसे होथें। इहू बात सोला आना सच हे, कतकों झन मन आज ये दैवीय शक्ति के दुरूपयोग करत हें। वोला लूटे के, ठगे के या कोनो ल प्रताडि़त करे के बुता करत हें। ए सब बर कोनो व्यक्ति दोषी हो सकथे, शक्ति के महत्व ह नहीं।

ये आध्यात्मिक या दैवीय पद्धति ले चिकित्सा करे म कतकों झन ल सफलता नइ मिलय, त वोकर दू कारण होथे।  एक, ईलाज करने वाला के पूर्ण सिद्ध नइ होना, अउ दूसर- स्वयं मरीज के द्वारा वो सब परहेज अउ नियम कायदा के पूरा नइ करना। दैवीय शक्ति ले संबंधित जम्मो जिनिस ल जाने या समझे के खातिर खुद वो प्रक्रिया ल पूरा करना परथे। काबर ते ये हर अनुभव जन्य ज्ञान के क्षेत्र आय। जेन एला अनुभव करथे, सिरिफ उही एकर बारे म जान सकथे। दुरिहा ले बइठ के कल्पना करने वाला एकर बारे म कुछू नइ जान सकय। जइसे कोनो विश्व विद्यालय के डिग्री पाए खातिर एक प्रक्रिया विशेष ल खुद पूरा करना होथे। परीक्षा आदि के कठोरता ल खुद नाहके बर लागथे, तइसने ये दैवीय शक्ति ल जाने, पहचाने या देखे खातिर एक विशेष प्रक्रिया, जेला सरल बोलचाल म साधना या सिद्धी कही देथन, वोला खुद ल पूरा करना परथे।


सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली,
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Monday, 17 April 2017

नंदिया कस आगू बढ़व...

नंदिया के एक सबले बड़े गुन होथे, वोला कतकों रोक ले, छेंक ले, मूंद ले, तोप ले फेर हर बंधन ल टोर के वो आगू बढ़ जाथे। बड़े-बड़े डोंगरी पहार आथे, पखरा अउ पटपर आथे वो जम्मो जगा ले अपन निकले के रद्दा निकाल लेथे। हम सबके जिनगी ल घलो अइसने होना चाही। कोनों कतकों रोके-छेके अउ भरमाए-भटकाए के उदिम रचय फेर, फेर हमार जेन लक्ष्य हे उहां तक पहुंचे के लगन हमेशा लगे रहय। जइसे नंदिया सागर म मिल के ही थिराथे, वसने हमूं मन अपन मंजिल म पहुंच के ही थिराइन।

नंदिया म एक अउ अच्छा गुन होथे। जब वोकर अस्तित्व ल खतम करे खातिर कोनो बड़का बांध के निरमान करे जाथे, त वोहर अपन कस अउ दू-चार छोटे-मोटे नंदिया-नरवा ल सकेल-जोर के बांधा के अहंकार म बूड़े बूड़ान ले अपन स्वाभिमान के अस्तित्व ल ऊँचा बना लेथे, अउ वोकर हर ऊँचाई ले नाहक के अपन मिशन ल पूरा करथे। आज ए माटी ल अइसने मिशन के रूप म काम करने वाला मन के जरूरत हे, जेन तन-मन अउ वचन-कर्म ले इहां के मूल आदि धर्म, संस्कृति अउ सामाजिक-आर्थिक स्वाभिमान खातिर नंदिया कस आगू बढ़ सकंय। बिना स्वार्थ के, बिना पद के, बिना कोनो मोह के। वोकर उद्देश्य केवल परोपकार रहय, परमात्मा राहय अउ हर किसम के पापाचार के संहार राहय।

मोला आज के टिपुर्री छाप राजनीति म तो एको अइसन मनखे नइ दिखय जेकर ऊपर कोनो किसम के भरोसा करे जा सकय। आज तक जतका झन संग मोर भेंट होइस सब फोसवा निकलिन। दू-चार ठोंस दाना कस मनखे घलोक दिखीस त वोमन अपन खुद के अस्तित्व रक्षा अउ पेट-पसिया के जुगाड़ म सरी जिनगी ल खपाए जावत हें।

जे मन सत्-धरम ले चाहथें के इहां के उद्धार होवय, त जइसे बड़का बांधा के गरब टोरे बर दू-चार अउ नंदिया मन अपन संपूर्ण अस्तित्व ल मूल नंदिया के कोरा म समर्पण कर देथें, वइसने मूल मिशन म भिड़े मनखे मन ला अपन ऊर्जा के खजाना ल पौंप देना चाही। प्रकृति के स्वभाव अउ व्यवहार ह हम सबके जीवन बर एक आदर्श के काम करथे, तेकर सेती वोकर हर घटना अउ रूप के गंभीरता ले चिंतन-मनन करना चाही। एक घांव बने-बने मनखे के आदत-व्यवहार ह धोखा दे दिही, फेर प्रकृति के कोनो भी रूप ह चिटको कनी घलो धोखा नइ देवय।

आज हमन इहां के मूल धरम, मूल संस्कृति अउ मूल निवासी मन के अधिकार के रक्षा के नांव म गुन-गुन के सुक्खा पान कस हाले-डोले ले धर लेथन। आपस म गोठियाथन के बाहिरी लोगन तो हमर अस्तित्व ल खतम करे म दिन दूना अउ रात चौगुना षडयंत्र रचत हें। कइसे करबो, कइसे बांचबो? फेर मैं अइसन किसम के चिंता-फिकर म अपन बेरा ल नइ पहावौं। काबर ते मोला दीया के स्वभाव मालूम हे। जब वोकर बुताए के बेरा आथे, त अउ जोर-जोर से भभकथे। अइसने बाहरी मनखे मन घलोक इहां के लोगन के अपन अस्तित्व रक्षा खातिर बाढ़त निष्ठा अउ ज्ञान ल देख के पाखण्ड के मात्रा ल बढ़ा दिए हें। उन बात-बात म राष्ट्रीयता के बात करथें। एक धर्म अउ एक राष्ट्र के बात करथें। फेर प्रश्न ये हे, एमन एक भगवान, एक जाति, एक वर्ण अउ एक संसार के बात काबर नइ करंय?

अइसन जम्मो किसम के पाखण्ड रचइया मन के डमडमा के पेट ल फोरे ले परही। इही मन सब डोंगरी-पहार आय, जे मन हमार मन के अस्तित्व खतम करे खातिर, हमन ल अपन गुलामी के खखौरी म चपके खातिर मुंड़ उठाये खड़े हें। हमन ल अइसन जम्मो बड़का अवरोध बांधा-छांधा मन ले जम्मो छोटे-छोटे नंदिया-नरवा कस एकमई होके आगू बढऩा हे, अपन लक्ष्य तक पहुंचना हे।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
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Thursday, 13 April 2017

गुरु बाबा के कहना...


नर-मादा की घाटी


 अलग-अलग धर्मों और उनके ग्रंथों में सृष्टिक्रम की बातें और अवधारणा अलग-अलग दिखाई देती है। मानव जीवन की उत्पत्ति और उसके विकास क्रम को भी अलग-अलग तरीके से दर्शाया गया है। इन सबके बीच अगर हम कहें कि मानव जीवन की शुरूआत छत्तीसगढ़ से हुई है, तो आपको कैसा लगेगा? जी हाँ!  यहाँ के मूल निवासी वर्ग के विद्वानों का ऐसा मत है। अमरकंटक की पहाड़ी को ये नर-मादा अर्थात् मानवी जीवन के उत्पत्ति स्थल के रूप में चिन्हित करते हैं।

 यह सर्वविदित तथ्य है कि छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति के लेखन में अलग-अलग प्रदेशों से आए लेखकों ने बहुत गड़बड़ किया है। ये लोग अपने साथ वहां से लाए ग्रंथों और संदर्भों के मानक पर छत्तीसगढ़ को परिभाषित करने का प्रयास किया है। दुर्भाग्य यह है, इसी वर्ग के लोग आज यहां शासन-प्रशासन के प्रमुख पदों पर आसीन हो गए हैं, और अपने मनगढ़ंत लेखन को ही सही साबित करने के लिए हर स्तर पर अमादा हैं। इसीलिए वर्तमान में उनके द्वारा उपलब्ध लेखन से हम केवल  इतना ही जान पाए हैं कि यहाँ की ऐतिहासिक प्राचीनता मात्र 5 हजार साल पुरानी है। जबकि यहाँ के मूल निवासी वर्ग के लेखकों के साहित्य से परिचित हों तो आपको ज्ञात होगा कि मानवीय जीवन का उत्पत्ति स्थल है छत्तीसगढ़।

 इस संदर्भ में गोंडी गुरु और प्रसिद्ध विद्वान ठाकुर कोमल सिंह मरई द्वारा 'गोंडवाना दर्शन" में धारावाहिक लिखे गए लेख - 'नर-मादा की घाटी" पठनीय है। इस आलेख-श्रृंखला में न केवल छत्तीसगढ़ (गोंडवाना क्षेत्र) की उत्पत्ति और इतिहास का विद्वतापूर्ण वर्णन है, अपितु यह भी बताया गया है कि यहाँ के सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला पर स्थित 'अमरकंटक" मानव जीवन का उत्पत्ति स्थल है। यह बात अलग है कि आज मध्यप्रदेश अमरकंटक पर अवैध कब्जा कर बैठा है, लेकिन है वह प्राचीन छत्तीसगढ़ का ही हिस्सा। इसे यहाँ के मूल निवासी वर्ग के विद्वान 'अमरकोट" कहते हैं, और नर्मदा नदी के उत्पत्ति स्थल को 'नर-मादा" की घाटी के रूप में वर्णित किया जाता है। नर-मादा से ही नर्मदा शब्द का निर्माण हुआ है।

 कोमल सिंह जी से मेरा परिचय आकाशवाणी रायपुर में कार्यरत भाई रामजी ध्रुव के माध्यम से हुआ। उनसे घनिष्ठता बढ़ी, उनके साहित्य और यहाँ के मूल निवासियों के दृष्टिकोण से परिचित हुआ। उनका कहना है कि नर्मदा वास्तव में नर-मादा अर्थात मानवीय जीवन का उत्पत्ति स्थल है। सृष्टिकाल में  यहीं से मानवीय जीवन की शुरूआत हुई है। आज हम जिस जटाधारी शंकर को आदि देव के नाम पर जानते हैं, उनका भी उत्पत्ति स्थल यही नर-मादा की घाटी है। बाद में वे कैलाश पर्वत चले गये और वहीं के वासी होकर रह गये। मैंने इसकी पुष्टि के लिए अपने आध्यात्मिक ज्ञान स्रोत से जानना चाहा, तो मुझे हाँ के रूप में पुष्टि की गई।

 मित्रों, जब भी मैं यहाँ की संस्कृति की बात करता हूं तो सृष्टिकाल की संस्कृति की बात करता हूं, और हमेशा यह प्रश्न करता हूं कि जिस छत्तीसगढ़ में आज भी  सृष्टिकाल की संस्कृति जीवित है, उसका इतिहास मात्र पाँच हजार साल पुराना कैसे हो सकता है?  छत्तीसगढ़ के वैभव को, इतिहास और प्राचीनता को जानना है, समझना है तो मूल निवासयों के दृष्टिकोण से, उनके साहित्य से भी परिचित होना जरूरी है। साथ ही यह भी जरूरी है कि उनमें से विश्वसनीय और तर्क संगत संदर्भों को ही स्वीकार किया जाए।

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9826992811, 7974725684

Monday, 10 April 2017

प्रकाशन सहयोग...आखर अंजोर...

किसी राजनीतिक परिवार की छवि रखने वाले कुल में एक अस्मिता प्रेमी का जन्म लेना किसी सद्कार्य के लिए अवतरित होने का संदेश होता है। पूरन बैस जी इसी संदेश-श्रृंखला की एक कड़ी हैं। इनके साथ मेरा पहला परिचय तब हुआ था, जब हम लोग छत्तीसगढ़ी के महान नाटककार-कथाकार स्व. श्री टिकेन्द्रनाथ जी टिकरिहा लिखित नाटक- 'गंवइहा* के मंचन के लिए (सन् 1991 में) अभ्यास कर रहे थे।

तात्यापारा स्थित कुर्मी बोर्डिंग में 'गंवइहा* का लगातार चार महीने तक रिहर्सल होता रहा। पूरन बैस जी इस नाटक के प्रमुख पात्रों में से एक थे, साथ ही निर्देशक मंडल के सदस्य भी थे। मैं इस नाटक में गीतकार और संगीतकार के रूप में जुड़ा हुआ था, इसीलिए हमारा यह परिचय घनिष्ठता में परिवर्तित हो गया। नाटक का मंचन रायपुर के प्रसिद्ध 'रंग मंदिर* में ऐतिहासिक सफलता के साथ संपन्न हुआ। बाद में इसका मंचन भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित 'लोकोत्सव* के अंतर्गत भी हुआ।

इसके पश्चात् हम लोगों के इस ग्रुप का बिखराव होने लगा, क्योंकि सभी सहयोगी अलग-अलग नैकरी पेशा और रोजगार से जुड़े हुए थे। मेरे जीवन में इसी दौर में एक नया परिवर्तन आया। मैं गीत-संगीत और साहित्य की दुनिया से विलग होकर आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर अग्रसर हो गया। इसलिए इस क्षेत्र के लोगों से मेरा संपर्क लगभग टूट सा गया।

साधना काल में मुझे छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसे मैं एक संक्षिप्त पुस्तिका का रूप देना चाहता था। 'आखर अंजोर* के रूप में संकलित इस पुस्तिका में यहाँ की मूल संस्कृति पर मेरे द्वारा लिखे गए लेखों के संकलन थे, जिसे सन् 2006 में पहली बार बालाजी प्रिंटर्स के संचालक श्री रामशरण कश्यप जी के सहयोग से प्रकाशित किया गया। तब तक मेरा साधना काल पूर्ण नहीं हो पाया था, इसलिए इसमें कुछ संशोधन और नये लेखन की आवश्यकता महसूस होती थी।

अब जब मेरा साधना काल पूर्ण हो चुका है, और इसमें आवश्यक संशोधन के साथ पुनप्र्रकाशन का संयोग बन रहा है, तब पूरन बैस जी के साथ मेरी पुन: मेल-मुलाकात हो गई है। मेरी साधना, यहाँ की संस्कृति और ऐतिहासिक लेखन के संबंध में उनसे चर्चा होने पर उन्होंने स्व-इच्छा से 'आखर अंजोर* को प्रकाशित करवाने का जिम्मा लिया। पूरन बैस जी और क्रियेटिव कम्प्यूटर के संचालक भाई अनिल चंद्राकर जी के माध्यम से 'आखर अंजोर* आप सब के समक्ष अपने नए कलेवर में मौजूद है।

विश्वास है, यह लघु पुस्तिका अपने नाम के अनुरूप 'आखर अंजोर* अर्थात् 'अक्षर का प्रकाश* फैलाएगी, और हमारी विस्मृत हो रही संस्कृति के मूल स्वरूप को पुनस्र्थापित करने में एक मील का पत्थर साबित होगी।

-सुशील भोले