Saturday, 28 September 2013

खदर-मसर होगे....

(छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की सबसे लोकप्रिय शैली ददरिया में आजादी के बाद देश और समाज में आ रहे परिवर्तनों पर हल्के-फुल्के ढंग से एक प्रयोग...)













अरे खदर-मसर होगे जी अब तो सुराज म
हाय गदर-फदर होगे जी जनता के राज म....

राजा नंदागे अब सांसद आगे
अउ पंच के बदला पार्षद आगे.....

चिट्ठी-पतरी के अब दिन नंदागे
मयारु संग गोठियाये बर मोबाइल आगे....

आमा-अमली ल अब नइ छुवन
मन होथे कभू त मिरिंण्डा पीथन....

नांगर-बइला गय अब टेक्टर आगे
पारा-मोहल्ला के बदला सेक्टर आगे....

नाचा-गम्मत के अब दिन पहागे
मनोरंजन के नांव म टीवी छागे....

धोती-कुरता के अब गम नइ मिलय
जिंस आगे पहिर ले तैं बिना सिलाय.....

मुंह ल रंगावन जब खावन बीरो-पान
अब माखुर-गुटखा आगे लेवथे परान....

सुशील भोले
संपर्क - 41/191, डा. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
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Thursday, 26 September 2013

दू गोडिय़ा...

आज तो दलदल में धंस गे हे, देख ले हमर पालनहार
रायपुर ले दिल्ली तक माते हे, दोगला-दलाली अउ भ्रष्टाचार.....

जेकर हाथ म दूध-रखवारी, उही लहुट जाथे रे बिलार
थाना-कछेरी म अब होथे, जुआ-चित्ती अउ बलात्कार....

राजनीति अब बेसिया बनगे, घर-घर हे वोकर लगवार
सत्-सेवा के मारग छूटगे, जइसे डोंगा हे बिन पतवार....

धरम-करम के पूंजी-पसरा, अब गांठ जमो छरियावत हे
ठग-जग बनगे पंडा-पुरोहित, साधु रोजी कमावत हे.....

हमर गली म कुकुर अबड़, बघवा सहीं हबकथें
राजनीति के लहू चिखे हें, जनता ल हांड़ा समझथें.....

गली-गली म अब तो होथे, हांव-हांव झिंकातानी
राजनीति के रूप बदलगे, चोरहा-लबरा चलाथें सियानी....

आगी लगगे कोइला म, डिजल-पेटरोल बिजरावत हे
महंगाई संग खांध जोर के, सरकार ठेंगा देखावत हे....

पद-पइसा अउ पावर खातिर, सबके नीयत डोलत हे
हरिश्चंद मन आज के देखौ, लबराबानी बोलत हें.....

परिया परत धान कटोरा, बंजर भुईं म लहुटत हे
मंत्री-संत्री खांध जोर के, अपनेच घर ल लूटत हे....

सोन-चिरइया फुदकय नहीं, पांखी-पांव कटागे हे
भ्रष्टतंत्र के राजशाही म, वोकर भाग नठागे हे.....

कइसे चलही देश के नइया, इही फिकर अबड़ होथे
त्राही-त्राही करत जनता, तीन धार के रोज रोथे.....

लम्हा-लम्हा तिलक लगाके, ढोंगी ढोल बजावत हे
धरम-करम ल जानय नहीं, जगतगुरु कहावत हे....

सुशील भोले
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Monday, 23 September 2013

मोती बानी....








सुशील भोले के सुन लेवव ये आय मोती बानी
सार-सार म सबो सार हे, नोहय कथा-कहानी

कोनो काम करे के पहिली मन म वोला गुन लेवव
नफा-नुकसान का होही सुपा म पहिली फुन लेवव

श्रद्धा के फल मिलथे वइसे जस चौमास के बरसा
कइसनो दनगारा छांड़े राहय, हरियाथे पूरा धरसा

जन सेवा ले बढ़ के नइये ये दुनिया म कहूं धरम
अपना लेथे जे ये मारग ल उही जानथे एकर मरम

काबर चुपरे राख ल बइहा, बनय ते मया चुपर लेना
छोड़ कपड़ा के उजराई, हिरदे ल उज्जर कर लेना

मया-पिरित अउ मीठ बोली ल जस देबे तस पाबे
मन-मंदरस म घोरे नइते, जुच्छा महुरा खाबे

नरम होथे जी वो फल ह जे होथे रसदार
ठक-ठकावत वो रहि जाथे जे होथे बेकार

रंगना हे त अंतस रंग, चोला के रंग उतर जाथे
घाम-पानी दूनो के मारे, फेर ये चोला सर जाथे

जिहां मुरख के पूजा होय उहां बिलमना नइ चाही
झर जाथे जस-कीर्ति, धन-दौलत नइ बांचय कांही

अपन दिया खुदे बनौ, खुद ल करौ अंजोर
मारग धलो खुदे बनावौ, झन भटकव चहुंओर

सुशील भोले
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Saturday, 21 September 2013

साहित्य सम्मान...


साहित्यिक बुलेटिन नई कलम के प्रथम स्थापना दिवस पर नवापारा-राजिम (छत्तीसगढ़) में आयोजित साहत्यि सम्मान समारोह में मेरा सम्मान।

Thursday, 19 September 2013

अचानकमार अभ्यारण्य में...


हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक (म.प्र.) में आयोजित कवि सम्मेलन के सिलसिले जाना हुआ...  इस दौरान छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध अचानकमार टाईगर रिजर्व अभ्यारण्य को भी देखने का अवसर मिला .... सोचे कि एक क्लिक तो हो ही जाये...

Tuesday, 17 September 2013

नई कलम का स्थापना दिवस....

साहित्यिक बुलेटिन नई कलम के प्रथम स्थापना दिवस पर रविवार 15 सितम्बर को नवापारा-राजिम (छत्तीसगढ़) में आयोजित कवि सम्मेलन में मेरा कवितापाठ.....

Friday, 13 September 2013

अलकरहा होगे....













आज बड़ा अलकरहा होगे, कोंदा टूरा लपरहा होगे
रिंंगी-चिंगी मन हीरा-मोती, टन्नक माल बजरहा होगे....

हमर गांव म देवता-धामी, अउ सरग बरोबर डेरा हे
तभो ले कइसे सूत-उठके, दरुहा मन के फेरा हे
ज्ञानी-ध्यानी जकला-भकला, पोथी पढ़इया अड़हा होगे.....

आज देश के हवा बदलगे, धरती के जम्मो पेड़ उजरगे
एसी-फ्रीज के चक्कर म, तन म कतकों रोग संचरगे
बड़े बिहनिया ले दंड-पेलइया, पहलवान बीमरहा होगे....

धरम-करम के साफा बांधे, अब तो भोगी, जोगी हे
सतयुग के आभा देखाथे, फेर मन के बिल्कुल रोगी हे
झकझक ले कपड़ा चमकाये, उज्जर रूप कजरहा होगे...

सुशील भोले
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Tuesday, 10 September 2013

सुरता हीरालाल काव्योपाध्याय


आज 11 सितंबर को छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सर्जक हीरालाल काव्योपाध्याय का स्मरण दिवस है। आज ही के दिन 11 सितंबर 1884 को उन्हेें गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के भाई की समिति द्वारा कोलकाता में काव्योपाध्याय की उपाधि प्रदान की गई थी।
ज्ञात रहे कि हीरालाल जी ने सन 1885 में छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना की थी, जिसे उस समय के विश्व प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन द्वारा अंगरेजी में अनुवाद कर छत्तीसगढ़ी और अंगरेजी में संयुक्त रूप से सन 1890 में प्रकाशित करवाया गया था।
यह भी ज्ञातव्य है कि उस समय तक हिन्दी का भी कोई मानक व्याकरण नहीं बन पाया था। हिन्दी का प्रथम मानक व्याकरण सन 1921 में कामता प्रसाद गुरु के माध्यम से बना।
हीरालाल जी काव्योपाध्याय की उपाधि प्राप्त होने के पूर्व अपना नाम हीरालाल चन्नाहू लिखते थे। वे धमतरी जिला के अंतर्गत ग्राम चर्रा (कुरुद) के मूल निवासी थे, किन्तु बाद में वे रायपुर के तात्यापारा में रहने लगे, जहां उनके पिताश्री तत्कालीन मराठा सेना में नायक के पद पर पदस्थ थे।
उस महान आत्मा को हमारा नमन, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी व्याकरण को विश्व पहचान दी।

सुशील भोले
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मेरा बचपन ....


बायें से- मेरी माँ श्रीमती उर्मिला देवी, मैं (सुशील), मेरे बड़े भाई सुरेश कुमार, पिताजी श्री रामचंद्र वर्मा और उनकी गोद में बहन प्रभा। 

Saturday, 7 September 2013

तीजा पर्व की शुभकामनाएं...














भाद्रपद शुक्लपक्ष तृतीया को पूरे छत्तीसगढ़ में तीजा का पर्व मनाया जाता है। यह भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पुत्री पार्वती द्वारा जो कठोर तपस्या की गई थी, का प्रतीक स्वरूप है।

यह बात स्मरणीय है कि छत्तीसगढ़ में इस पर्व को संपन्न करने के लिए विवाहित महिलाएं अपने पिता के घर (मायका) आती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि पार्वती इस तप को कुंवारी अवस्था में अर्थात अपने पिता के यहां रहकर पूर्ण की थीं, इसीलिए इस पर्व को संपन्न करने के लिए यहां की विवाहित महिलाएं भी अपने पिता के घर आती हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि केवल छत्तीसगढ़ में ही यह एक ऐसी परंपरा है, जिसमें विवाहित महिलाएं अपने पिता के घर आकर किसी पर्व को संपन्न करती हैं। शायद इस देश के किसी अन्य क्षेत्र में ऐसी कोई प्रथा नहीं है।

आप सभी माताओं को... बहनों को... तीजा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.....

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
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Friday, 6 September 2013

तोर मेहनत के लागा ल.....














तोर मेहनत के लागा ल, तोर करजा के तागा ल
उतार लेतेंव रे, मैं ह अपन दुवार म.........

देखत हावौं खेत-खार म जाथस तैं ह
मंझनी-मंझनिया देंह ठठाथस तैं ह
जाड़ न घाम चिन्हस, बरखा न बहार देखस
ठउका उही बेर तोला पोटार लेतेंव रे, मैं ह अपन.......

कहिथें बंजर-भांठा हरियाथे उहें
तोर मेहनत के पछीना बोहाथे जिहें
परबत सिंगार करय, नंदिया दुलार करय
ठउका इही बानी महूं दुलार लेतेंव रे, तोला अपन....

तैं तो दानी म बनगे हस औघड़ दानी
भले नइए तोर बर खदर के छानी
सुख ल तिरियाई देथस, दुख ल कबियाई लेथस
ठउका अइसनेच म तोला जोहार लेतेंव रे, मैं ह अपन....

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, डॉ. बघेल गली,
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Wednesday, 4 September 2013

पोरा : नंदीश्वर जन्मोत्सव...


आज भाद्रपद अमावस्या को भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्त, सेवक और सवारी नंदीश्वर का जन्मोत्सव पूरे छत्तीसगढ़ में पोरा पर्व के रूप में धूम-धाम के साथ मनाया जा रहा है।
पोरा पर्व के अवसर पर मिट्टी से बने नंदी की पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाकर पूजा की जाती है। बच्चे इस दिन मिट्टी से बने नंदी (बैल) को खिलौनों के रूप में खेलते भी हैं। इस अवसर पर बैल दौड़ का आयोजन भी किया जाता है।
ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं आदि धर्म कहता हूं वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने के लिए हमें फिर से प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।
मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के इस सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
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