Thursday, 29 January 2015

राजिम में कुंभ-मेला से पहले...

राजिम में माघ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाले कुंभ-मेला की प्ररंभिक तैयारी देखने गये, तो त्रिवेणी का हाल देखकर बड़ा दुख हुआ। देखिये आप भी महानदी, पैरी नदी और सोढूर नदी के संगम स्थल का मेला पूर्व यह हाल....









Wednesday, 28 January 2015

सुशील भोले के चार डांड़ - 1

सच के सुजी ह बस नानेकुन होथे
फेर लबराही फुग्गा ल फुस ले कर देथे
कतकों पोत पाउडर चेहरा उजराये बर
फेर बेरा के ताप ह करिया के छोड़थे

            * * * * *

सच के दुकान म लबरा तराजू
फोकला धरा देथे कहिके जी काजू
आज चारोंखुंट देखौ इही हाल दिखथे
ठोसहा-रतन मनला कर देथें बाजू

           * * * * *

संस्कृति बिन अधूरा हे भाषा-आन्दोलन
जस मड़वा बिन अधूरा होथे मंगरोहन
तब काबर गुनिक मन एला छोड़ देथें
चलौ गा चेत करौ दूनों ल धरके दंदोरन

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

राजिम में अस्तित्व तलाशती त्रिवेणी



मानव को अपने जीवन-पथ पर अनवरत सुचारु रुप से चलते रहने के लिए संस्कृति और सभ्यता का ठीक वैसा ही महत्वपूर्ण योगदान होता है जैसा कि भोजन, हवा और पानी का योगदान शरीर को स्वस्थ रखने के लिए होता है। संस्कृति और सभ्यता जीवन के सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक स्वरुप को सुघड़ बनाने के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह अनिवार्य आधरशीला होती है। इसके बगैर मनुष्य समुदाय मात्र मांस का लोथड़ा रह जाएगा। चाहे वह कोई भी क्षेत्र का हो, राष्ट्र हो या राज्य हो, सभी पर यह समान रूप से लागू होता है और छत्तीसगढ़ राज्य भी इसका अपवाद नहीं है।

छत्तीसगढ़ में तीज-त्यौहार, मेला-मड़ई और धार्मिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों से ओतप्रोत जनमानस सदियों से ही जीवंत रहा है। यहां की संस्कृति ही उत्सवधर्मी है। गांव-गांव में मड़ई का आयोजन बड़े हर्ष और उल्लास के साथ किया जाता है। जहां विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक भी दिखाई पड़ती है। इसी का वृहत रूप मेला है। अक्सर मेला का कार्यक्रम वहीं आयोजित किया जाता है जहां से नदी होकर गुजरती है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में नदियों का विशेष महत्व है। यहां नदियों को पूजनीय माना गया है और माता का दर्जा दिया गया है और जहाँ तीन-तीन नदियों का मेल हो, वह संगम स्थल और भी पावन-प्रणम्य हो जाता है। भारत की बेटी छत्तीसगढ़ के आँचल में राजिम नगरी भी ऐसा ही तीर्थ स्थल है जो तीन-तीन नदियों की धार समेटे अपने अस्तित्व को गौरवान्वित कर रही है। भगवान श्री राजीवलोचन और कुलेश्वरनाथ के पग पखारती महानदी, पैरी और सोंढूर नदियां कलकल प्रवाहित होते उदधि संगम करती हैं। इसी वजह से पुरातन काल से यहां मेला का आयोजन मांघी पूर्णिमा से शिवरात्रि तक बड़े ही धूमधाम से किया जाता रहा है। इस अवसर पर विभिन्न स्थलों  से लोग धार्मिक आस्था लिए आते हैं। वक्त की गहराइयों में दबी परतें अनेक इतिहास लिए राजिम के सांस्कृतिक वैभव में श्रीवृद्धि करती रही हैं, जो कि बदस्तूर जारी है।

 समय की धार में आधुनिक जीवन शैली, राजनीतिक दांवपेंच और सदैव आगे बढऩे की अदम्य लालसा ने कहीं न कहीं मानव को उन्नति के साथ साथ कमजोर भी किया है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद राजिम मेला का स्वरूप भी बदल गया। पारंपरिक रूप से मनाए जारे रहे चार कुंभों के साथ-साथ पांचवा कुंभ राजिम में आयोजित होता है। आश्चर्य की बात यह है कि पारंपरिक कुंभों का आयोजन तो कई वर्षों से होता आ रहा है, पर राजिम कुंभ का जन्म लोगों के मानस में पिछले कुछ वर्षों से हुआ। जिसका आयोजन प्रतिवर्ष हो रहा है, यूं लगता है कि विगत पारंपरिक कुंभों के इतिहास से स्पर्धा कर रहा है। कुंभ का अर्थ घट से है। यहां इसका अर्थ नदी के संगम या कुंड से लगाते हैं। राजिम में मेला पहले एक निर्धारित मैदान में ही हुआ करता था। लोग संगम में स्नान करते, मंदिरों के दर्शन कर मेला का आंनद उठाते। अब इसका स्वरूप वृहत हो गया है। पुरानी जगह के साथ साथ अब नदी में दूर दूर तक मेला भरता है। सड़कें बनायी जाती हैं। पानी, बिजली, डोम, साधू-संतों के लिए आवास व्यवस्था और अन्यान्य सुविधाओं के साथ-साथ सांस्कृतिक महोत्सव भी होता है। गंगा आरती भी की जाती है। ये तो हुई मेला के वृहत स्वरूप की बातें, जो बाद में बेटी की विदाई जैसा लगने वाला कार्यक्रम लगता है। जैसे लुटा-पिटा बाप अपने खाली घर को देख छटपटाता और तड़पता है, ठीक वैसी ही अनुभूति होती है।

उन संवेदनशील हृदयों को जिन्हें थोड़ा भी लगाव है महानदी से, राजिम के सांस्कृतिक वैभव से वे सुने एक बार, छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी, गौरवगंगा चित्रोत्पला, स्वर्गसलिला, कंकनंदिनी, अमृत रस निरझरा माँ त्रिवेणी की करुण आवाज को, जो सोढूर-पैरी को सहचरी बनाती सहस्र सहस्र लहरों से लहराती, उद्दाम वेग से छलछलाती थी, आज अपने वर्तमान स्वरुप को देख स्वयं विस्मित है। इंसान भी बूढ़ा होता है, तो क्रमश: शारीरिक परिवर्तन दिखाई देता है मगर यहां तो बात ही कुछ और है।

संगम में बनती रपटें जो प्रतिवर्ष कुंभ के नाम पर बनायी जाती है, रेत का उत्खनन, कारखानों का रसायन और नवापारा-राजिम की गंदी नालियों का पानी रंग गईं हैं त्रिवेणी को। सिमट रही, सिकुड़ रही बिलख रही नदी और हम कुंभ मना रहे हैं! ऐसा लगता है, कैक्टस लगाने के लिए वृहत पीपल काट रहे हैं। कब तक गाते रहेंगे हम, दिखावे की गंग-आरती? जहां संगम ही नहीं है वहां मटमैला सा पानी बांधकर, हम व्यथित हृदय को बांधने की कोशिश करते हैं। कहां है संगम की धार? आखिर क्यूं पड़ रही उसे अपनों की मार? आस्था दीप अश्रुबनने लगते हैं, जब नदियों पर चलते ट्रैक्टर मिट्टियां उठा उठाकर नदियों का दामन पाटते हैं, धार को मोड़ते हैं। कुंभ आयोजन के पश्चात दृष्टिगोचर होता है मात्र काईयुक्त सड़ांध मारता नाले का कीड़ायुक्त पानी, जो हमारे स्वार्थ और निष्ठुरता की पराकाष्ठा को प्रमाणित करता है। क्या फायदा ऐसे  कुंभ से जहां हम अपने सांस्कृतिक विरासत की रक्षा न कर सकें।

वर्तमान में बांधों से पानी छोड़ कर नदियों का स्वरूप बनाने की कोशिश की जाती है। पर गर्मी में पूरे का पूरा पाट रेगिस्तान हो जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों  के हवन राख और भभूतियां रेत में ही डाली जाती हैं। ऐसे में हम अगर चैन से मेला की चकाचौंध में ही चौंधियाए रहें तो वह दिन दूर नहीं जब हमें पछताना पड़ेगा। चिर प्रतीक्षित एनीकट के लम्बे समय बाद निर्माण के बाद भी क्या वजह है जो पीछे पानी नहीं ठहर पाता है। बरसात में अंगड़ाई लेती लहरों को अगर यूं ही छोड़ दिया जाए तो कई गांव काल कवलित कर सकने वाली महासलिला यूं सूख क्यों जाती है।

कार्यक्रमों का शुभारंभ और समापन होता है और संत समागम भी! अनुरोध है सिर्फ आधे धंटे निहारे जाकर महानदी को। पूछें उसकी लहरों से कि उसकी पीड़ा कितनी सुखदायी है या यह कुंभ पर्व कितना दुखदायी है! समस्त संवेदनशील भाई-बहनों से मेरा अनुरोध है कि इस बारे में सोचें। हमारे राजिम का वैभव धूमिल न होने पाए। नदियों को संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ी नदियों के अस्तित्व को पा सकें और ये मेला भी सतत लगता रहे। हवा-पानी और स्वास्थ्य की तरह बची रहे हमारी नदी-संस्कृति और सुदृढ़ रहे हमारी रीड़ की हड्डियां।

श्रीमती सुधा शर्मा
ब्राह्मण पारा, राजिम
जिला-गरियाबंद (छत्तीसगढ़)
मोबाइल-09993048495
(फोटो एवं प्रस्तुति ः सुशील भोले)

तेजस की धमाचौकड़ी...

तेजस अब नौ महीने का हो गया है... घर-आंगन में इसकी धमाचौकड़ी देखते ही बनती है.




Saturday, 24 January 2015

वंदे मातरम...











घर-घर ले अब सोर सुनाथे वंदे मातरम
लइका-लइका अलख जगाथें वंदे मातरम...
देश के पुरवाही म घुरगे वंदे मातरम
सांस-सांस म आस जगाथे वंदे मातरम
रग-रग म तब जोश जगाथे वंदे मातरम....
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम मिलके गाथें
कहूं बिपत आये म सब खांध मिलाथें
तब तोर-मोर के भेद भुलाथे वंदे मातरम....
हितवा खातिर मया लुटाथे वंदे मातरम
बैरी बर फेर रार मचाथे वंदे मातरम
अरे पाक-चीन के छाती दरकाथे वंदे मातरम...
सुवा-ददरिया-करमा धुन म वंदे मातरम
भोजली अउ गौरा म सुनथन वंदे मातरम
तब देश के खातिर चेत जगाथे वंदे मातरम...
सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Friday, 23 January 2015

जय माँ शारदे...












जय माँ शारदे... माँ शारदे..... माँ शारदे....
सप्तसुरों को झंकृत कर दे, ज्ञान-कला भर दे...

श्वेत हंस पर चढ़ कर मैया, मेरे दर पर आजा
अपनी वीणा के सरगम से तन-मन ये झनका जा
फिर गूंजे मेरा भी स्वर, यहां ऐसा कुछ कर दे....
जय माँ शारदे.....

* सुशील भोले

Thursday, 22 January 2015

छत्तीसगढ़ी लेखन म शब्द के चयन

छत्तीसगढ़ राज बने के बाद अउ खास करके छत्तीसगढ़ी ल ये राज म राजभाखा के दरजा मिले अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के स्थापना होय के बाद छत्तीसगढ़ी लेखन ह भरदरागे हवय। अब उहू मन छत्तीसगढ़ी म लिखे बर धर लिए हें, जे मन कभू हमन ल संकीर्ण अउ राष्ट्रभाषाद्रोही होए के आरोप लगावत राहंय। फेर ये भरदराये लेखन म इहू देखब म आवत हवय के लोगन कतकों शब्द मनला बिगाड़ के या फेर आने-ताने शब्द के प्रयोग करके लिखत हावंय।

खास करके मोला अइसन देखे बर ए सेती मिलथे काबर ते मैं कई ठन पत्र-पत्रिका मन के संपादन के बुता म कोनो न कोनो किसम ले जुड़े रहिथंव। एकरे सेती जुन्ना साहित्यकार मन के संगे-संग नवा-नेवरिया मन के लेखन अउ उंकर शब्द चयन के पाला मोर संग परत रहिथे। अलग-अलग क्षेत्र के लोगन के अलग-अलग शब्द चयन संग घलोक मुठभेड़ होवत रहिथे। तब लागथे के अभी तक एकर मानक रूप के निर्धारण या पालन काबर नइ हो पाय हे, जेमा जम्मो क्षेत्र के लोगन एके किसम के शब्द मन के उपयोग कर लेतीन?

उदाहरण खातिर मैं अइसन मनखे के लिखे शब्द अउ वाक्य ल ए मेर रखना चाहत हंव, जेकर छत्तीसगढ़ के संगे-संग देश भर म एक भाषा-वैज्ञानिक के रूप म चिन्हारी हवय, अउ वो हें- डॉ. विनय कुमार पाठक जी। संगी हो, मैं कोनो नवा-नेवरिया लेखक के लिखे ल जान-बूझके उदाहरण के रूप म नइ रखना चाहंव, काबर ते वोकर लेखन म अंगरी उठाये के अबड़ अकन ठउर मिल सकत हे।

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रांतीय सम्मेलन 2014 के स्मारिका के पृष्ठ क्र. 10 म डॉ. विनय कुमार पाठक के एक लेख छपे हवय, शीर्षक हे- 'छत्तीसगढ़ के चिन्हारी : भाषा-साहित्य के जुबानी'। ये लेख के शुरुवात ल बने चेत लगाके पढ़व, काबर ते हम एकरे ऊपर चरचा करबो। लिखे गे हे- 'छत्तीसगढ़ी साहित्य भारतेंदु युग ले ओगर के आज के इक्कीसवीं सदी के चौदा बछर म हबरगे हे।' 

अब ये वाक्य ऊपर मोर दू-तीन ठन प्रश्न हवय, आपो मन जुवाब दे के कोशिश करहू। सबले पहला प्रश्न- छत्तीसगढ़ी साहित्य संग भारतेंदु के का संबंध हे? का हिंदी या खड़ी बोली के भारतेंदु के पहिली ले छत्तीसगढ़ी म लेखन होवत नइ आवत हे? हमर इहां लोक साहित्य के जेन खजाना हवय वो ये बात ल सिद्ध करथे के भारतेंदु के पहिली ले छत्तीसगढ़ी म लेखन होवत आवत हे।

हमर इहां के विद्वान मन छत्तीसगढ़ी साहित्य के पहला प्रयोग आज ले 600 साल पहिली सन् 1497 म चारण कवि बलराम राव खैरागढ़ वासी  ले करे के उदाहरण देथें-
लक्ष्मीनिधी राय सुनौ चित्त के गढ़ छत्तीसगढ़ न गढैय़ा रही
मरदूमी रही नहीं मरदन के फेर हिम्मत ले न लड़ैया रइही।। 

एकरो ले आगू बढिऩ त छत्तीसगढ़ी के जुन्ना रूप ल दंतेवाड़ा म सन् 1703 अउ वोकर कोरी भर पाछू आरंग के अभिलेख म घलोक देखे के बात कहे जाथे। संत कबीर के शिष्य अउ वोकर समकक्ष धनी धरमदास के 'जामुनिया के डार मोर टोर देव हो...' जइसन रचना मनला घलोक छत्तीसगढ़ी के जुन्ना रूप के उदाहरण खातिर देखाये जाथे। त फेर एला भारतेंदु युग ले ओगरे के बात काबर कहे जाथे? कहूं ये ह छत्तीसगढ़ी ल भारतेंदु माध्यम ले हिंदी के पिछलग्गू बनाय के प्रयास तो नोहय?

मोर दूसरा प्रश्न- 'छत्तीसगढ़ी साहित्य भारतेंदु युग ले 'ओगर' के...' का साहित्य या भाखा ह 'ओगरथे'? 'ओगरना' शब्द ल हमन पानी खातिर प्रयोग करत रेहे हावन के वो कुआं या झिरिया ले तुरते पानी 'ओगरे' ले धर लिस गा। फेर भाखा या साहित्य खातिर हम कभू 'ओगरे' शब्द के प्रयोग न सुने रेहेन न करे रेहेन। हां भई, भाखा या साहित्य ह 'उद्गरथे' वोकर जनम होथे, उत्पत्ति होथे।

मोर तीसरा प्रश्न- 'छत्तीसगढ़ी साहित्य..... आज के इक्कीसवीं सदी के चौदा बछर म हबरगे हे।' सुरता रखव- 'हबरगे हे'। मोला लागथे के इहां 'हबरगे' शब्द ह वतका अच्छा नइ लागत हे, जतका 'संघरगे' जइसे कोनो शब्द लिखे जातीस। बिलासपुर अउ रायगढ़ क्षेत्र म पहुंचे खातिर 'हबरना' शब्द के प्रयोग करे जाथे, फेर रायपुर अउ दुरुग क्षेत्र म 'हबरना' ल टकराये खातिर उपयोग म लाये जाथे। बेलसपुरिहा मन तो कहिथें के- 'लट्टे-पट्टे टेसन हबरेंव रे ददा, नइते गाड़ी छूट जाये रहितीस।' फेर रइपुरिहा मन इही 'हबरे' शब्द के प्रयोग अइसे करथें- 'लट्टे-पट्टे बांचेंव रे ददा कोठ म हबरगे रेहेंव, मुड़-कान फूट जातीस।'

मोला जिहां तक थोक-मोक जानकारी हे तेकर अनुसार रायपुर-दुरुग के छत्तीसगढ़ी ल ही गुनिक मनखे मन मानक रूप म अपनाये के गोठ करथें। डॉ. विनय कुमार पाठक के छवि एक भाषा-वैज्ञानिक के हवय त उंकर ले अइसन शब्द प्रयोग के आशा करे जाथे, जेला चारोंखुंट स्वीकारे जाय।

इही सरलग म मोला स्व. हरि ठाकुर के एक ठन कविता के सुरता आवत हे। उन जाड़ के महीना के संदर्भ म लिखथें-
ताम-कलस अस बाल सुरुज हर
क्षितिज ऊपर मडिय़ावत हे।
फरिका मन जम्हावत हें
बछरू मन रम्भावत हें।।

कतेक सुघ्घर दृश्य अउ कल्पना। फेर एमा शब्द मन के प्रयोग देखव- बाल सुरुज क्षितिज ऊपर 'मडिय़ावत' हे। जाड़ के दिन म उत्ती बेरा के सुरुज के प्रयोग उछाह-मंगल, रउनिया तापे जइसे म होथे। वो ह 'मडिय़ावय' नहीं। बइला-भइंसा या घेक्खर मनखे मन मडिय़ाथें। सुरुज तो निरंतर रेंगे के प्रतीक आय। अब इही कविता के आगू के डांड़ म चलव- 'फरिका मन जम्हावत हें, बछरू मन रम्भावत हें'। रंभाना शब्द के प्रयोग गाय खातिर जरूर करे जाथे, फेर बछरू खातिर कभू नइ करे जाय। बछरू मन नरियाथें, रंभावय नहीं।

संगवारी हो, ए ह छोटकुन उदाहरण आय के छत्तीसगढ़ी लेखन ल बने चेत लगा के करे जाय। छत्तीसगढ़ी के नांव म कुछ भी नइ लिखे जाना चाही। एकर ले हमर भाखा-साहित्य के हिनमान होये के संभावना रहिथे। मोर वोकरो मनले अरजी हे, जेमन शब्द ल बिगाड़ के लिखत रहिथें। जइसे संस्कृति ल संसकिरिति, शब्द ल सब्द, सुशील ल सुसील, ऋषि ल रिसि आदि-आदि। मैं ये सिद्धांत के पोषक आंव के हमन जब लेखन खातिर नागरी लिपि ल आत्मसात करे हावन त वोकर जम्मो शब्द (अक्षर / वर्ण) मनके प्रयोग ल घलोक करन। वोमा कोनो किसम के छेका-बांधा झन करन।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com
   

Monday, 19 January 2015

सुशील भोले को समाज गौरव सम्मान.....

संत सुकृतदास जी के करकमलों से सम्मानित होते सुशील भोले
संत सुकृतदास जी के करकमलों से सम्मानित होते सुशील भोले
कार्यक्रम के संयोजक डा. सुखदेवराम साहू *सरस* वक्तव्य देते हुए
(सम्मान समारोह में उपस्थित जनसमूह)
 समाज गौरव प्रकाशन, रायपुर के तत्वावधान में रविवार 18 जनवरी 2015 को कर्मा विद्यालय, सुपेला चौक, भिलाई में राज्य स्तरीय सामाजिक प्रतिभा सम्मान, कवि सम्मेलन एवं पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। कबीर आश्रम सेलुद, दुर्ग के प्रमुख संत सुकृत दास जी के मुख्यआतिथ्य एवं वरिष्ठ रंगकर्मी-फिल्म अभिनेता शिवकुमार दीपक की अध्यक्षता में मुझे (सुशील भोले ) साहित्य एवं छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति के लिए विशेष कार्य करने के लिए सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर प्रदेश भर से आये साहित्य, कला एवं सामाजिक क्षेत्र की प्रतिभाएं उपस्थित थीं। समाज गौरव प्रकाशन के प्रमुख डॉ. सुखदेवराम साहू *सरस* ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया।

Tuesday, 13 January 2015

सोसन

बछरु ह 
एक दिन गाय जघा पूछिस-
दाई...
शोषण काला कहिथे...?
त... गाय कहिस -
बेटा...
तैं ह....
खूंटा म बंधाये
जुच्छा पैरा ल पगुरावत रहिथस
अउ
हमर मालिक ह
मोर थन के दूध ल दुह के
अपन बेटा ल पियाथे
इही ल तो शोषण कहिथे।
* * * * * * * * * * * * * * *
शोषण 
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बछड़े ने
एक दिन गाय से पूछा -
माँ
शोषण कहते किसे हैं
गाय ने कहा -
तुम खूँटे में बँधे-बँधे ख़ाली पुआल को पगुराते रहते हो
और मालिक
मेरे थन से सारा-का-सारा दुध दुहकर
अपने बेटे को पिलाता है
यही तो शोषण कहलाता है ।
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- मूल छत्तीसगढ़ी - सुशील भोले 
- अनुवाद - जयप्रकाश मानस
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Friday, 9 January 2015

छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण और अवर सचिव का पत्र....

छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना दिवस पर दिये जाने वाले राज्य अलंकरणों में साहित्य के क्षेत्र में दिये जाने वाला पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान के संदर्भ में मैंने (सुशील भोलेे) मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिखकर इसे छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के लिए कार्य करने वाले साहित्यकारों को  ही प्रदान करने अथवा छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के लिए स्वतंत्र रूप से कोई अन्य अलंकरण प्रदान करने के संबंध में लिखा था। क्योंकि सुंदरलाल शर्मा अलंकरण को यहां ऐसे भी व्यक्तियों को भी प्रदान किया जा रहा है, जिन लोगों का यहां की भाषा, संस्कृति अथवा अस्मिता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

मेरे इस पत्र के संदर्भ में श्री जे.एन. अवस्थी अवर सचिव छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के माध्यम से संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व को पत्र क्र. 619/टीएल 30/सं./2014 दिनांक 27-12-2014 के माध्यम से इस विषय पर संबंधित आवेदक एवं विभाग को जानकारी सुनिश्चित कराने के लिए कहा गया है।

मित्रों, किसी भी राज्य का अलंकरण वहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता पर आधारित कार्य करने के लिए होता है। लेकिन इस प्रदेश में ऐसे लोगों को सम्मानित किया जा रहा है, जिनका यहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है। हमारा किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत कोई विरोध नहीं है, लेकिन यहां की जनभाषा के लिए कार्य करने वालों के मुंह से निवाला छीनकर अन्य लोगों को यह सम्मान दिया जायेगा तो निश्चित रूप से उसका विरोध किया जायेगा।

 आप सभी से अनुरोध है कि मेरी इस लड़ाई में सहभागी बनकर यहां की जनभाषा छत्तीसगढ़ी को स्वतंत्र रूप से सम्मानित करने के लिए आवाज बुलंद करें।
धन्यवाद,

आपका
सुशील भोले
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

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मेरे फेसबुक में इस पर टिप्पणियां...
छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण और अवर सचिव का पत्र....
छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना दिवस पर दिये जाने वाले राज्य अलंकरणों में साहित्य के क्षेत्र में दिये जाने वाला पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान के संदर्भ में मैंने (सुशील भोलेे) मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिखकर इसे छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के लिए कार्य करने वाले साहित्यकारों को ही प्रदान करने अथवा छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के लिए स्वतंत्र रूप से कोई अन्य अलंकरण प्रदान करने के संबंध में लिखा था। क्योंकि सुंदरलाल शर्मा अलंकरण को यहां ऐसे भी व्यक्तियों को भी प्रदान किया जा रहा है, जिन लोगों का यहां की भाषा, संस्कृति अथवा अस्मिता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।
मेरे इस पत्र के संदर्भ में श्री जे.एन. अवस्थी अवर सचिव छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के माध्यम से संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व को पत्र क्र. 619/टीएल 30/सं./2014 दिनांक 27-12-2014 के माध्यम से इस विषय पर संबंधित आवेदक एवं विभाग को जानकारी सुनिश्चित कराने के लिए कहा गया है।
मित्रों, किसी भी राज्य का अलंकरण वहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता पर आधारित कार्य करने के लिए होता है। लेकिन इस प्रदेश में ऐसे लोगों को सम्मानित किया जा रहा है, जिनका यहां की भाषा, संस्कृति और अस्मिता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है। हमारा किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत कोई विरोध नहीं है, लेकिन यहां की जनभाषा के लिए कार्य करने वालों के मुंह से निवाला छीनकर अन्य लोगों को यह सम्मान दिया जायेगा तो निश्चित रूप से उसका विरोध किया जायेगा।
आप सभी से अनुरोध है कि मेरी इस लड़ाई में सहभागी बनकर यहां की जनभाषा छत्तीसगढ़ी को स्वतंत्र रूप से सम्मानित करने के लिए आवाज बुलंद करें।
धन्यवाद,
आपका
सुशील भोले
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com