Wednesday, 29 October 2014

तभे आही लेखन म निखार...

अइसे कहे जाथे के कोनो भी भाखा ल जब प्रकाशन के मंच मिलथे, त वोमा अउ वोखर लेखन म धीरे-धीरे निखार आए लगथे। छत्तीसगढ़ी भाखा संग ये कहावत ह रिगबिग ले देखब म आवथे। बोलइया मन म जिहां राष्ट्रीय अउ अंतरष्ट्रीय भाखा संग संपर्क म आए के सेती नवा-नवा शब्द के प्रयोग देखे बर मिलत हे, उहें लेखन म घलोक स्तर म बढ़ोत्तरी के संगे-संग विषय के बढ़वार दिखत हे। एक समय रिहीसे जब छत्तीगसढ़ी के नांव म सिरिफ पद्य रचना उहू म पारम्परिक गीत शैली म ही लिखे जावत रिहीसे, उहें अब पद्य के संग-संग गद्य लेखन म विषय के विविधता देखे जावत हे।

छत्तीसगढ़ी के लेखन ल कुछ इतिहासकार मन कुछ जुन्ना मंदिर म मिले ताम्रपत्र अउ शिलालेख के माध्यम ले मानथें, उहें कुछ साहित्यकार मन संत कबीर दास के बड़का चेला  धनी धरमदास के निरगुन रचना  'जमुनिया के डार मोर टोर देख हो..." आदि ले मानथें। फेर मोला लागथे के वोमन म आरूग छत्तीसगढ़ी के प्रयोग नइ हो पाये रिहीसे। भलुक उत्तर भारत के अन्य बोली मन संग सांझर-मिंझर करके लिखे गे रिहीसे। भलुक ये कहना जादा अच्छा होही के उन्नीसवीं सदी तक अइसने गढऩ के लिखे जावत रिहीसे। शायद एकर पाछू ए भावना रिहीस होही के इंकर मन के रचना ल आने क्षेत्र के पाठक मन घलोक पढ़ अउ समझ जावयं।

  जिहां तक प्रकाशन म छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप देखे के बात हे, त एला हम काव्योपाध्याय हीरालाल चन्नाहू के छत्तीसगढ़ी व्याकरण ल मान सकथन। एकर आगू चल के डॉ. दयाशंकर शुक्ल के संपादन म प्रकाशित छत्तीसगढ़ी मासिक ले बढ़ोत्तरी रूप ल देख सकथन। ए समय छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप के संगे-संग लेखक मन के संख्या म घलोक बढ़ोत्तरी देखे बर मिलिस। आज हमन छत्तीसगढ़ी लेखन के पहिली पीढ़ी के रूप म जेकर मन के नांव के उल्लेख बड़ा आदर के साथ करथन सब उही समय के उपजन-बाढऩ आय। एकर बाद डॉ. विनय कुमार पाठक के संपादन म 'भोजली" नांव के एक तिमाही पत्रिका आइस, अउ एकरे साथ छत्तीसगढ़ी के लेखन म व्यापकता घलोक आइस। इहां एक बात जरूर उल्लेखित करे जाना चाही के ए समय तक छत्तीसगढ़ी के लेखन ह जादातर पद्य तक ही सीमित रिहीसे।

कहूं हम पत्रिका के संपूर्ण रूप ल देखिन त सुशील वर्मा 'भोलेे" के संपादन म प्रकाशित छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिली पत्रिका 'मयारू माटी" ल मान सकथन। काबर ते एकर पहिली प्रकाशिन दूनो पत्रिका 'छत्तीसगढ़ी मासिक" अउ 'भोजली" मन म जादा करके पद्य रचना छपत रिहीसे। ए दृष्टि ले वोमन ल सिरिफ गद्य-पद्य संकलन के ही श्रेणी म रखे जा सकथे, सम्पूर्ण पत्रिका के श्रेणी म नहीं। भाखा विज्ञानी डॉ. बिहारी लाल साहू के बोले ये बात सही लगथे के 'मयारु माटी" ही छत्तीसगढ़ी के असली पत्रिका रिहीसे, जेकर आज घलोक कोनो पूर्ति नइ कर पाइन हें।" भले आज वोकर बाद तिमाही 'लोकाक्षर" अउ चौमाही 'बरछाबारी" घलोक घपत हे, फेर पत्रिका पढ़े के जेन संतुष्टि होथे, वोला सिरिफ मयारू माटी ह पूरा करत रिहीसे। ए बीच म जागेश्वर प्रसाद के संपादन म साप्ताहिक छत्तीसगढ़ी सेवक घलोक छपत रिहीसे, फेर वोकर कुछ पर्व विशेष म निकलने वाला अंक मन के छोड़े बाकी मनला पत्रिका के श्रेणी म शामिल नइ करे जा सकय।

ए बीच म एक बहुत अच्छा बात ए होइस के इहां के कुछ दैनिक समाचार पत्र मन मड़ई, चौपाल, अपन डेरा, पहट आदि के नांव ले छत्तीसगढ़ी म परिशिष्ट निकालत हें। अभी हाले म जयंत साहू ह 'अंजोर" नाव के एक मासिक बुलेटिन निकालत हे। एकर मन के प्रकाशन ले मयारू माटी संग भरदराए गद्य लेखन ह विविध विषय संग देखे ले मिलत हे। वइसे छत्तीसगढ़ी के लेखन ह अब ये परिशिष्ट मन के छोड़े घलोक बहुत अरूग हिन्दी पत्र-पत्रिका मन म  देखे ले मिलत हे। खास कर के छत्तीसगढ़ राज बने के बाद, अउ वोकरो ले जादा राज्य सरकार द्वारा एला राजभाषा घोषित करे के बाद।

फेर अब लागथे के छत्तीसगढ़ी के लेखन ल बोली के मापदण्ड ले ऊपर उठ के भाषा के मापदण्ड म लिखे जाना चाही। जइसे लोकभाषा मन ले परिष्कृत हिन्दी ल नागरी लिपि के वर्णमाला के सबो अक्षर संग सजा के शुद्ध बनाए गीस, वइसने छत्तीसगढ़ी ल घलोक नागरी वर्णमाला के सबो अक्षर संग गुंथ के शुद्ध बनाए जाना चाही। तेमा एला पढ़ाई अउ आने कारज खातिर गैर छत्तीसगढ़ी भाषी जे मन नागरी लिपि ल जानथें उहू मन एला आसानी के साथ अपन सकयं। पूरा देश अउ नागरी लिपि के जनइया दुनिया के जम्मो लोगन एला पढ़ समझ अउ आत्मसात कर सकय।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

Tuesday, 28 October 2014

सिहावा की पुण्यभूमि में कवि सम्मेलन...


शनिवार 25 अक्टूबर 2014 को महानदी उद्गम क्षेत्र के ग्राम सेमरा (सिहावा) में विराट कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मेरा काव्यपाठ....





Friday, 24 October 2014

गौरा-गौरी अउ मातर परब...

दीपावली के पावन पर्व पर छत्तीसगढ़ में शिव- पार्वती विवाह को गौरा-गौरी परब के रूप में मनाया गया। हमारे मोहल्ले में आयोजित गौरा परब का एक दृश्य.....



मातर परब....
मित्रों आज (कार्तिक शुक्ल द्वितीया को) छत्तीसगढ़ में मातर का पर्व मनाया जा रहा है.. मातर के इस पर्व मेंं मड़ई जागरण का पर्व भी मनाया जाता है... इसी के साथ समूचे छत्तीसगढ़ में मेला-मड़ई का पर्व प्रारंभ हो जाता है..


Tuesday, 21 October 2014

दीपावली की शुभकामनाएं...

 जम्मो संगवारी मनला सुरहुत्ती, देवारी, गौरा-गौरी बिहाव, गोवर्धन पूजा अउ मातर के जोहार-भेंट ... बधाई. अउ शुभकामना....

सुशील भोले

Monday, 20 October 2014

दीया तरी अंधियार...

(छत्तीसगढ़ी व्यंग्य)

तइहा जमाना ले ये सुनत आवत हवन के *दीया तरी अंधियार* होथे। पहिली समझ म नइ आवत रिहीसे के अइसे कइसे हो सकथे, जिहां बरत दीया रइही तिहां अंधियार कइसे हो सकथे। फेर अब जब थोक बहुत ऐती-तेती झांके-तांके ले सीखत हावन त थोक-थोक जनाए बर धर लिए हे के सिरतोन म दीया तरी अंधियार होथे।

आजे के बात आय माता लक्ष्मी के वाहन घुघुवा ल बइहा-भुतहा बरोबर अकेल्ला किंजरत देखेंव त बड़ा ताज्जुब लागीस। लरी-लरी कपड़ा-लत्ता म धंधाए घुघुवा बर मोला दुख घलोक लागीस। वोकर हाल ल देखके जनाइस के अइसने होथे दीया तरी अंधियार! लक्ष्मी के वाहन, फेर बने गतर के कपड़ा अउ बपरा बिन पनही-भंदई के उखरा किंदरत रिहीसे। पूछे म बताईस के आज माता लक्ष्मी के घरों-घर पूजा-पाठ होवत हे, तेकर सेती वोला वार्षिक अवकाश दे दिए गे हवय।

बपरा रोनहुत होवत बताइस के का करबे भइया साल म एकेच दिन तो छुट््टी मिलथे। बाकी के 364 दिन तो सांस ले के घलोक फुरसुद नइ मिलय। वोकर अतेक भक्त हें के एकक दिन म कई-कई जगा जाये ले परथे। कभू कोनो राजनेता घर तेे कभू बैपारी घर ते कभू फिलमी कलाकार घर फेर मोला अचरज लागथे भइया के ये महतारी ह सिरिफ पइसच वाले घर काबर जाथे ते? अरे कभू-कभार हमार जइसे गरीब-गुरबा घर घलोक चल देतीस त का हो जातीस। मोर घुघवी कई पईत मोला ठेसरा घलोक देथे के लक्ष्मी माता ल तैं रोज कतकों घर लेगथस, एके दिन म कई-कई शिफ्ट ड्यूटी बजाथस फेर हमरो घर तो एको पइत लान लेतेस! लइका मन पूछथें घलोक लक्ष्मी कइसे होथे (दिखथे) कहिके।

का करबे भाई एकरे सेती आजो के दिन अपन घर ले भागे-भागे फिरथौं। लइका मनला चिरोर-बोरोर पइसा खातीर रोवत-गावत देखबे त बड़ा दुख लागथे। मैं पूछेंव- कस जी, तैं लक्ष्मी के वाहन होके गरीबी के गोठ करथस। तोला तनखा-उनखा नइ मिलय। अभी तो ठउका देवारी आय हे बोनस घलोक झोंके होबे।

वोहर मुंह एकदम से ओथरगे। कहीस-कइसे गोठियाथस संगवारी, मैं उहां नौकरी थोरे करथौं जी तेमा तनखा अउ बोनस झोकहूं। अरे भई मैं तो सेवा करथौं गा... धरम सेवा। मोला वोकर गोठ सुनके ताज्जुब लागीस के काबर के एहू ह धारमिक सोसन के शिकार हे। हमर देस म धरम के नांव म कतकों किसम के सोसन होथे। जइसे बड़े-बड़े आसरम खोल के लोगन अपन तो चंदा बरारी अउ भावना बेचे के बैपार करथें, अउ घुघुवा कस अपढ़ भक्त मनला फोकट म सेवक राख लेथें। जादा होगे त दूनो जु़वर के खाना-पीना, साल म एकाद पइत कपड़ा-लत्ता अउ लइका-पिचका मन के बोरे-बासी के पुरती थोर-बहुत चांउर-दार अउ नून-मिरचा द दे देथें। बपरा मन पइसा-कौड़ी के दरसन करे बर घलोक तरस जाथें।

मैं पूछेंव के आज तो घरों-घर पूजा होथे त फेर आज के दिन तोला वार्षिक अवकाश कइसे मिल जाथे। त वो कहीस-आने दिन वोकर पूजा ह सिरिफ लक्ष्मी भर के रूप म होथे ना जे ह एकाद घड़ी म सिरा जाथे, एकरे सेती एती-तेती जावत बन जाथे। फेर आज के दिन महालक्ष्मी के रूप म वोकर पूजा होथे जे ह पूरा रात दिन चलथे, एकरे सेती वो जिहां जाथे, रमडिय़ा के बइठ जाथे, तभे तो मोला साल म एक दिन छुट्टी मिल पाथे।

वोकर बात ल सुन के मोर मन ह थोरुक कोंवर होगे। मैं पूछेंव-अच्छा, ये बता घुघुवा भाई, साल भर के एक छुट्टी ल तैं कइसे मनाथस? का देवारी म तैं ह अपन घर पूजा-पाठ नइ करस? वो कहिस-का बताबे भइया लोग लइका के पइसा मांगे के डर म मैं दिन भर एती-तेती किंजरत रहिथौं, अउ रतिहा म जब लइका मन रो-धो के सूत जथें त कलेचुप घर म जाथौं तहांले घुघुवी संग थोर-बहुत मुंहाचाही कर के सुत जाथौं। काबर ते बिहनियां ले फेर माता लक्ष्मी के दरबार म हाजरी बजाना रहिथे, तेमा वोहा अपन भक्त मन घर पइसा बरसाये बर जा सकय।

घुघुवा के जीवन-यात्रा ल सुन के मोला *दीया तरी अंधियार* काबर होथे तेकर ठउका जानबा मिलगे।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
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Saturday, 18 October 2014

पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा


आज के नवा छत्तीसगढ़ म पंडवानी गायन ल एक बड़का विधा के रूप म देखे जाथे, माने जाथे अउ गाये घलोक जाथे। एकरे सेती आज एकर गायक-गायिका मनला पद्मश्री ले लेके कतकों अकन राष्ट्रीय अउ राज्य स्तर के सम्मान मिलत रहिथे। फेर ये बात ल कतका झन जानथें के ये विधा के जनमदाता कोन आय, ए विधा ल गावत कतका बछर बीत गये हे?

आप मनला ये जान के सुखद आश्चर्य होही के नवा बने जिला बलौदाबाजार के गांव झीपन (रावन) के किसान मुडिय़ा राम वर्मा के  सुपुत्र के रूप म जनमे नारायण प्रसाद वर्मा ला ये पंडवानी विधा के जनमदाता होय के गौरव प्राप्त हे। वोमन गीता प्रेस गोरखपुर ले छपे सबल सिंह चौहान के किताब ले प्रेरित होके वोला इहां के लोकगीत मन संग संझार-मिंझार के पंडवानी के रूप म विकसित करीन।

मोला नारायण प्रसाद जी के झीपन वाला घर म जाये अउ उंकर चौथा पीढ़ी के सदस्य संतोष अउ नीलेश के संगे-संग एक झन गुरुजी ईनू राम वर्मा के संग गोठबात करे के अवसर मिले हे। ईनू राम जी ह नारायण प्रसाद जी के जम्मो लेखा-सरेखा ल सकेले के बड़ सुघ्घर बुता करत हवय। संग म गांव के आने सियान मन संग घलोक मोर भेंट होइस, जे मन नारायण प्रसाद जी ल, उंकर कार्यक्रम ल देखे-सुने हवयं। उन बताइन के धारमिक प्रवृत्ति के नारायण प्रसाद जी सबल सिंह चौहान के संगे-संग अउ आने लेखक मन के किताब मनके घलोक खूब अध्ययन करयं, अउ उन सबके निचोड़ ल लेके वोला अपन पंडवानी के प्रस्तुति म संघारंय।

पंडवानी शब्द के प्रचलन
नारायण प्रसाद जी ल लोगन भजनहा कहंय, ये हा ये बात के परमान आय के वो बखत तक पंडवानी शब्द के प्रचलन नइ हो पाये रिहिस हे।  पंडवानी शब्द के प्रचलन उंकर मन के बाद म चालू होय होही। काबर के आज तो अइसन जम्मो गायक-गायिका मनला पंडवानी गायक के संगे-संग अलग-अलग शाखा के गायक-गायिका के रूप म चिन्हारी करे जाथे। जइसे कापालिक शैली के या फेर वेदमती शाखा के गायक-गायिका के रूप म।

नारायण प्रसाद जी अपन संग म एक सहयोगी घलोक राखयं, जेला आज हमन रागी के रूप म जानथन। रागी के रूप म उंकरेच गांव के भुवन सिंह वर्मा जी उंकर संग म राहंय, जउन खंजेरी बजा के उनला संग देवयं। अउ नारायण प्रसाद जी तबूंरा अउ करताल बजा के पंडवानी के गायन करंय। उंकर कार्यक्रम ल देख के अउ कतकों मनखे वइसने गाये के उदिम करंय, एमा सरसेनी गांव के रामचंद वर्मा के नांव ल प्रमुखता के साथ बताये जाथे। फेर उनला वो लोकप्रियता नइ मिल पाइस जेन नारायण प्रसाद जी ला मिलिस।

रतिहा म गाये बर प्रतिबंध
नारायण प्रसाद जी के लोकप्रियता अतका जादा बाढग़े रिहिस हवय के उनला देखे-सुने खातिर लोगन दुरिहा-दुरिहा ले आवंय। जिहां उंकर कार्यक्रम होवय आसपास के गांव मन म खलप उजर जावय। एकरे सेती चोरी-हारी करइया मन के चांदी हो जावय। जेन रतिहा उंकर कार्यक्रम होवय वो रतिहा वो गांव म या आसपास के गांव म चोरी-हारी जरूर होवय। एकरे सेती उनला रतिहा म कार्यक्रम दे खातिर प्रतिबंध के सामना घलोक करना परीस। एकरे सेती उन पुलिस वाला मनके कहे म सिरिफ दिन म कार्यक्रम दे बर लागिन।

एक मजेदार घटना के सुरता गांव वाले मन आजो करथें। बताथें के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र म उंकर कार्यक्रम चलत रिहिसे। उहों ले चोरी-हारी के शिकायत मिले लागिस। अंगरेज शासन के पुलिस वाले मन उनला ये कहिके थाना लेगें के वो ह कार्यक्रम के आड़ म खुद चोरी करवावत हे। बाद म असलियत ल जाने के बाद उनला छोड़ दिये गेइस।  जानबा राहय के उंकर पंडवानी के कार्यक्रम ह पूरा देश म होवय, उन देश भर म चारोंखुंट जावयं।

प्रशासनिक क्षमता
नारायण प्रसाद जी एक उच्चकोटि के कलाकार अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम  के पुरोधा होय के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता रखने वाला मनखे घलोक रिहिन हें। उन अपन जिनगी के अखिरी सांस तक गांव पटेल के जि मेदारी ल निभावत रिहिन हें। एकर संगे-संग गांव म अउ कुछु भी बुता होवय त अगुवा के रूप म उन हमेशा आगू रहंय।

लगातार 18 दिन तक कथापाठ
अइसे कहे जाथे के पंडवानी या महाभारत के कथा ल लगातार 18 दिन तक नइ करे जाय। एला जीवन के आखिरी घटना के संग जोड़े जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी ये धारणा ल झूठलावत अपन जिनगी म दू पइत ले 18-18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन हें। एक पइत जब उन शारीरिक रूप ले बने सांगर-मोंगर रिहिन हें, तब पूरा बाजा-गाजा के संग करे रिहिन हें, अउ दूसरइया बखत जब उंकर शरीर उमर के संग कमजोर परे ले धर लिये रिहिस हे, तब बिना संगीत के सिरिफ एकर वाचन भर करे रिहिन हें।

अइसे बताये जाथे के पहिली बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करे रिहिन हवयं तब ये अफवाह फैल गे रिहिस हावय के ये 18 दिन के गायन के तुरते बाद उन समाधि ले लेहीं, एकरे सेती उन 18 दिन तक गायन करत हावंय। काबर ते अइसन गायन ल जीवन के अंतिम समय के घटना संग जोड़े के बात जनमानस म रिहिस हे। एकरे सेती उनला देखे के नाम से चारोंमुड़ा ले जनसैलाब उमड़ परे रिहिस हे।  दूसरइया बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन तेकर बाद उन खुदेच जादा दिन तक जी नइ पाइन, कुछ दिन के बाद ही उन ये नश्वर दुनिया ल छोड़ के सरग सिधार देइन।

मठ अउ जनआस्था
हमर समाज म अइसे चलन हवय के घर-गिरहस्ती के जिनगी जीने वाला मनके देंह छोंड़े के बाद उनला मरघट्टी म  लेग के आखिरी क्रिया-करम कर दिये जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी के संग अइसन नइ होइस । उनला मरघट्टी  लेगे के बदला गांव के तरिया पार म मठ बना के ठउर दे गइस। अउ सिरिफ अतकेच भर नहीं उनला आने गांव-देंवता मन संग संघार लिये गइस। अब गांव म जब कभू तिहार-बार होथे त गांंव वाले मन आने देवी-देवता मन के संग म उंकरो मठ म दीया-बत्ती करथें, अउ उंकर ले गांव अउ घर खातिर सुख-समृद्धि मांगथें। अइसे कहे जाथे के सन् 1972 म जब उन सरग सिधारीन तब उंकर उमर करीब 80 बछर के रिहिस हवय।

पारिवारिक स्थिति
नारायण प्रसाद जी के वंशवृक्ष के संबंध म जेन जानकारी मिले हे तेकर मुताबिक उंकर सियान के नांव मुडिय़ा राम वर्मा रिहिस हे। फेर नारायण प्रसाद जी, नारायण जी के बेटा होइस घनश्याम जी, अउ घनश्याम जी के बेटा होइस पदुम जी। पदुम जी के दू झन बेटा हवयं संतोष अउ निलेश जउन मन अभी घर के देखरेख करत हवंय।

इहां ये बताना जरूरी लागथे के नारायण प्रसाद जी के बेटा घनश्याम घलोक ह अपन सियान सहीं कथा वाचन करे के कोशिश करयं, फेर उन बिना संगीत के अइसन करंय। उंकर बाद के पीढ़ी म पंडवानी गायन या वाचन डहर कोनो किसम के झुकाव देखे ले नइ मिलिस। आज उंकर चौथा पीढ़ी के रूप म संतोष अउ निलेश हवंय, फेर इंकर पूरा बेरा सिरिफ खेती किसानी तक ही सीमित हे। एकरे सेती हमला नारायण प्रसाद जी के संबंध म वतका जानकारी नइ मिल पाइस, जतका मिलना रिहिस हे। कहूं उंकर वारिस मन घलोक ये रस्ता के रेंगइया रहितीन या लिखने-पढऩे वाला होतीन त पंडवानी के ये आदिगुरु आज लोगन के बीच अनचिन्हार बरोबर नइ रहितीन, पूरा देश-दुनिया म उंकर सोर-खबर रहितीस।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
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Friday, 17 October 2014

गोल्लर ल गरुवा सम्मान

(छत्तीसगढ़ी व्यंग्य)

जबले अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ल शांति के नोबल पुरस्कार मिले हे, तब ले जम्मो किसम के मान-सम्मान अउ पुरस्कार ल चना-फुटेना बरोबर बांटे के रिवाज हमरो इहां चलगे हे। अइसे बात घलोक नइ हे के पहिली अइसन नइ होवत रिहीसे। पहिली घलोक अइसन होवत रिहीसे। जेन मनखे ल अपन सम्मान करवाना होवय वोहा कोनो अइसन किसम के आयोजक ल एकर ठेका दे देवय, जेन ह पचीस-पचास आदमी ल जोर-सकेल के एकाद झन झोला छाप नेता किसम के आदमी ल अतिथि बना के बला लेवय। माईक अउ साल-नरियर के संगे-संग जम्मो सकलाए मनखे के चाय-नास्ता के व्यवस्था ल तो सम्मानित होवइया ह खुदे करय।

फेर अब जबले बराक ओबामा ल शांति के नोबल मिले हे, तबले अइसन किसम के सम्मान समारोह के रूप रंग ह बदल गे हे। अब लोगन ये कोसिस करथें के कोनो बड़का असन समिति ह सम्मान समारोह के ठेका लेवय, जेमा मंत्री-संत्री, प्रेस-मीडिया, बाजा-रुंजी सबो के व्यवस्था राहय। सबले बड़े बात ए के समिति ह साल, नारियर प्रमाण-पत्र के संगे-संग कड़कड़ाहवत नोट घलोक देवय। ए बात अलग हे के समिति ह अइसन जिनीस के जुगाड़ चाहे कहूंचो ले करय। मंत्री-संत्री मन तो वइसे फूल-माला पहिरे अउ पहिराये खातिर पूरा कार्यक्रम के खरचा उठाए के परंपरा चालू करी डारे हें। अइसने किसम के अउ कतकों नेता परानी मिल जाथें जे मन खरचा के थोक-थोक बोझा ल अपन-अपन खांधा म बोह लेथें। अइसे-तइसे करके जम्मो किसम के खरचा के व्यवस्था हो जाथे।

पुरस्कार पाये खातिर सधाए मनखे जब पहिलीच ले एती-तेती मटमटावत रहिथें, तब तो कोनो बात ल आयोजक मन अपन पब्लिसिटी अउ जान-पहिचान खातिर आयोजन करथें, त पुरस्कार झोंकइया मनला खोजे ल लागथे। एकर खातिर लिस्ट बनाये जाथे वोमा सबले पहिली नम्बर आथे राजनीतिक सत्ता म बइठे लोगन के, वोकर बाद प्रशासनिक सत्ता म बइठे लोगन के, एकर बाद मीडिया म अउ तब फेर आथे चापलूसी के सिंहासन म बइठे चरण-भाट मनके। आजकाल जतका भी सम्मान समारोह या पुरस्कार वितरण होवत हे सबो के मापदण्ड लगभग अइसने किसम के हे। एकरे सेती योग्य मनखे के कहूं कोती पुछारी नइ रहिगे हे।

अइसना करइया आयोजक मनला जब पूछबे के कइसे जी तुमन तो अपात्र मनखे के सम्मान करत हौ, त उन झट ले कहि देथें- त ओबामा ह शांति के नोबल खातिर कोन से मार योग्य रिहीसे। का दुनिया के मनखे ये बात ल नइ जानत हें के अमरीका ह पूरा दुनिया खातिर गोल्लर ढीलाये हे तेन ला? जब भी कोनो देस थोरको एती-तेती करथे त ए हर पूरा फौज- फटाका लेके उहां धावा बोल देथे। अफगानिस्तान अउ इराक संग का करिस तेला सबो जानत हें। लादेन के वोकरे सेती लद्दी-पोटा निकलगे हे, एती-तेती लुकाय-लुकाय किंदरत रिहिसे। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ल कइसे ढंग के फांसी दिस इहू बात ल सब जानत हें।

अरे भई ये सब तो दुरिहा के बात होइस। तोर अपन घर ल देख। पाकिस्तान ह  रोज दिन तोला काकर बल म आंखी देखाथे? उहां के जम्मो आतंकवादी बनाये के फेक्टरी मनला कोन पइसा देथे? दुनिया के नान-नान देस मनला कोन हथियार बेच -बेच के आपस म लड़वावत रहिथे? त मोला बता अइसन किसम के मरखण्डा गोल्लर कस देस के मुखिया ल गरुवा बरोबर मान के शांति के नोबल पुरस्कार कइसे दिए जा सकथे? अउ जब वोला अइसन विरोधाभासी सम्मान दिए जा सकथे त हमूं मन कोनो भी ल काबर विरोधाभासी सम्मान नइ दे सकन?

अपन गलती ल सही बताय खातिर लोगन जगा एक ले बढ़ के एक तर्क होथे। एकरे सेती वो कहि सकथे बराक ओबामा के कार्यकाल ह तो आने मनले शांतिपूर्ण बीतत हे। अभी महीना भर पहिली वो हर परमाणु नि:शस्त्रीकरण खातिर बुता करीस हे, एकर पाछू डेनमार्क के राजधानी कोपेनगेहन म दुनिया के वायु मंडल ल कार्बन उत्सर्जन ले बचाए खातिर पर्यावरण के समर्थन खातिर काम करत हे। तब तो वोला शांति खातिर पुरस्कार मिल सकथे।

माने दुनिया ल अपन बात ल साबित करे के कोनो न कोनो बहाना मिली जाथे। फेर ए मन ल कोन समझावय के साहित्य, संस्कृति, कला या समाजसेवा के क्षेत्र म अइसन किसम के तक-वितर्क नइ चलय। आयोजक ल जेकर-जेकर सुरता आथे वो सब सम्मान के हकदार होथे। सम्मानित होने वाला चाहे खेदू राहय, ते बिसाहू। चरणभाट राहय ते चंचला।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
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Wednesday, 15 October 2014

एक पतरी रैनी-बैनी



शास्त्र आधारित संस्कृति अउ लोक संस्कृति के अलग-अलग रूप ल देख के कई परत अकचकासी तको लाग जथे। तब मन म बात उठथे के का शास्त्र मनला हमर तइहा ले चले आवत परंपरा के आधाार म नइ लिखे गे हे? अब छत्तीसगढ़ के सबले मयारुक परब गौरी-गौरा पूजा के लोक रूप अउ ये देस के धारमिक आस्था के भारतीय रूप ल देखन। हिन्दू धरम म ये मान्यता हे के सावन, भादो, कुंवार अउ कातिक के ये चार महीना म देवता मन सूते रहिथें तेकर सेती कोनो किसम के मांगलिक कार्यक्रम नइ होना चाही। फेर हम गौरा पूजा के लोक रूप ल देखन त ए बात के खंडन देखे म आथे।

गौरा-पूजा जेला गौरा-गौरी घलोक कहे जाथे ए हा इहां के परंपरा के मुताबिक भगवान शिव अउ पारवती के बिहाव के परब आय। अउ ए ह होथे कब? कातिक अमावस्या माने देवउठनी के दस दिन पहिली। जब देवउठनी के दस दिन पहिली हमर सबले बड़का भगवान के बिहाव होगे त फेर वोकर मन के सूते रेहे के या फेर ये चातुरमास ल कोनो भी मांगलिक कार्य खातिर अशुभ माने के प्रश्ने कहां उठथे? एकरे सेती अइसे लागथे के हमन ल जेन धरम ग्रंथ के रूप म साहित्य उपलब्ध करवाए जावत हे, वो ह लोक परंपरा के अनुरूप बिल्कुल नइए।

गौरा-गौरी के परब वइसे तो कातिक अमावस्या के दिन संपन्न होथे, फेर एकर शुरूवात लगते कातिक ले छोकरी मन के बिहनिया कातिक नहाए अउ संझा सुवा नाचे ले शुरू हो जाथे। इहां कातिक नहाए के रिवाज एकरे सेती हे के ये महीना म भगवान भोलेनाथ संग पार्वती के बिहाव होथे एकरे सेती नोनी मन कातिक नहा के शिव पूजा करथें, तेमा उहू मनला वोकरो सही योग्य वर मिलय। अइसने सुवा गीत ह घलोक गौरा-गौरी परब संग जुड़े हे। जेमन गौरा-गौरी पूजा के आयोजन करथें, ते मन ए गीत-नृत्य के माध्यम ले लोगन घर जा-जा के शिव-बिहाव म आए के नेवता देथें अउ संगे-संग वो दिन आने वाला खरचा के बेवस्था खतिर सेर सिधा अउ पइसा-कउड़ी सकेलथें।

गौरा जगाय के बुता गौरा-पूजा के नौ दिन पहिली हो जाथे। गौरा चौरा ल गोबर पानी म लीपे-पोते जाथे। सुरहुत्ती के दिन मुंदरहा ले कुंवारी माटी जेला कोनो भिंभोरा ले कोड़ के लाने जाथे। तेकर पाछू गांव के बइगा ह रंग-बिरंग के चमकीला कागज म सजावत वोला गौरा-गौरी के अलग-अलग मूर्ति बनाथे। गौरा-गौरी परब के हर एक रिवाज खातिर अलग-अलग लोक गीत के गायन करे जाथे। जइसे-
मारे कुदारी ईसर देव के
उहां कुम्हरा भइया करे ल बसेर
०००

भइया ले कहेंव, भइया बढ़ई
हमर ईसर ल दे
हाथ खंगे नोनी गोड़ खंगे
कइसे ईसर ल देवंव
०००

लाले-लाले परसा
लाले हे खमार
लाले हे ईसर राजा
घोड़वा सवार          
०००

आठे कोसन के अंखरा छोलइले
नवे कोसर के फेर
अंखरा-अंखरा झन रट बाबू
अंखरा होथे बढ़ फेर
०००

जागव गौरा मोर जागव गौरी ओ
जागव ओ सहर के लोग
०००

एक पतरी रैनी-बैनी रायरतन मोर दुरगा देवी
तोरे शीतल छांव
०००

ये जम्मो लोक गीत ल गौरा-गौरी के बिहाव परब म वइसने गाये जाथे जइसे हमन अपन इहां होने वाला बर-बिहाव म अलग-अलग नेंग खातिर गाथन-नाचथन-बाजा बजवाथन।
सुरहुत्ती के आधा रात के गौरा-गौरी के मुख्य आयोजन शुरू होथे, जेन ह बिहनिया कोनो नंदिया या तरिया म वोकर मन के  विसरजन तक चलथे। एकर पहिली गौरा चौरा ले तरिया या विसर्जन स्थल तक लेगे के पहिली रस्ता म परने वाला जम्मो घर के दुवारी म रूकत-रूकत जाथें जेकर संंबंधित घर वाले मन पूजा-आराधना करथें।

गौरा-गौरी पूजा के संगे-संग अब लक्ष्मी पूजा घलोक करे जाथे, जेला भगवान राम के वनवास काल के बाद वापस अयोध्या लहुटे के प्रतीक स्वरूप मनाये जाथे। अइसने सुरहुत्ती के बिहान दिन भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र के कोप ले गोकुल ल बचाए खातिर उठाए के गोवर्धन पर्वत के प्रतीक स्वरूप गोवर्धन पूजा अउ वोकर बिहान दिन मातर के आयोजन करे जाथे।

सुशील भोले
संपर्क : 54-191, कस्टम कालोनी के सामने,
डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811
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Thursday, 9 October 2014

छत्तीसगढ़ी म एमए के पढ़ई, माने बिन नेंव के घर गढ़ई

कोनो भी भाखा के पढ़ई ल अ आ इ ई ले शुरू करे जाथे तब जाके अं अ: के पारी आथे। अइसने जब कहूं मेर अपन बर घर-दुवारी, महल-अटारी बनाबे त पहिली नेंव कोड़ के वोला भरबे तेकर पाछू वोकर ऊपर छत ऊपर छत ढारत जाबे तभे वोहर इच्छा मुताबिक बनही या कहिन के सही मायने म उपयोग लायक बनही। बिना नेंव के घर कब रदरद ले भोसक जाही तेकर कोनो ठिकाना नइ राहय। जिहां तक छत्तीसगढ़ी भाखा ल शिक्षा के माध्यम बनाये के बात हवय त उहू ल इही मानक संग देखे जाना चाही। माने पहिली प्राथमिक शिक्षा दिए जाना चाही, तेकर पाछू फेर उच्च शिक्षा।

हमर रायपुर के पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा छत्तीसगढ़ी भाखा म एमए के पढ़ई चालू करे गे हवय। मैं व्यक्तिगत रूप ले ए कारज के सुवागत करथौं। अभी इहां के शिक्षा विभाग ह घलोक हायर सेकेंडरी म छत्तीसगढ़ी ल एक विषय के रूप म पढ़ाये के बात करे हावय। मैं व्यक्तिगत रूप ले ये निर्णय के घलोक सुवागत करथौं। जे मन अपन सद्प्रयास ले अइसन बुता करत हें, वोकर मन के भावना के मैं सम्मान करथौं।  फेर जिहां तक व्यावहारिक या कहिन तकनीकी रूप ले देखिन त ए बात ह बड़ा उजबक किसम के लागथे। काबर ते जब हम कोनो लइका ल प्राथमिक शिक्षा छत्तीसगढ़ी म दे नइ हन अउ हर्रस ले एमे-वोमे पढ़ाये ले घर लेबो त वोला कोनो भी भाखा के  प्रारंभिक ज्ञान अउ अभ्यास कइसे हो पाही? अभी इहां जे मन एमे-वोमे करे हें या करत हें वोमा के कतकों झन ल मैं व्यक्तिगत रूप ले जानथौं। वोकर मन के लिखे-पढ़े अउ समझे के स्तर ल देखथौं त बड़ा दुख होथे।

अइसन दुखदाई छापा सिरिफ पढऩे वाला मन के नहीं भलुक पढ़ाने वाला गुरुजी मन के घलोक देखे बर मिलथे। काबर ते उन जम्मो झन हिन्दी माध्यम ले पढ़ के गुरूजी बने हें न कि छत्तीसगढ़ी माध्यम ले। जतका झन छत्तीसगढ़ी म एम ए या अन्य कक्षा पढ़ाने वाला हें, उन सबो झन ला दस-दस पेज के मौलिक छत्तीसगढ़ी लेखन खातिर कहि दौ, अउ फेर उंकर मन के जांच करौ, त सब पता चल जाही के उंकर छत्तीसगढ़ी के ज्ञान कतका आरूग अउ ठोस हे।

अतका तो निश्चित जानव के कहूं वोमन छत्तीसगढ़ी ल प्राथमिक स्तर ले पढ़त आए रहितीन त हमर मन के दशा ह उंकर कारज म अंगरी उठाये के लायक नइ रहितीस! एकरे सेती दुनिया के जम्मो बड़का विद्वान प्राथमिक शिक्षा ल महतारी भाखा के माध्यम ले दे के बात करथें। हमर संविधान तको म ए बात स्पष्ट रूप ले लिखाय हवय के प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम ले दिये जाना चाही। त फेर एला का समझे जाना चाही के हमर सरकार ह संविधान के उल्लंघन करत हावय?

शासन के महत्वपूर्ण पद म बइसे एक-दू संगवारी मन संग मोर ये विषय म चरचा होथे, त उन हर्रस ले ये कहि देथें के गणित, विज्ञान अउ आने विषय के किताब ल छत्तीसगढ़ी म कइसे लिखहू। अउ नइ लिख सकव त वोला शिक्षा के माध्यम कइसे बना पाहू। अइसन संगवारी मनला मोर सिरिफ अतके कहना हवय के उन  अभी एकदम से उच्च शिक्षा के गोठ झन करंय काबर के एहर लम्बा रस्दा आय। एकर बर बड़का बेरा लागही। फेर उच्च शिक्षा के झांसा दे के प्राथमिक शिक्षा के रस्दा ल तोपे नइ जाना चाही। बल्कि होना ये चाही के प्राथमिक शिक्षा के व्यवस्था ल तुरंत कर के उच्च शिक्षा के रस्दा ल धीरे-धीरे करत खोले जाना चाही।

जिहां तक प्राथमिक शिक्षा के किताब के बात हे त एला आसानी के साथ बनाये जा सकथे। इहां के तमाम शिक्षाविद् अउ साहित्य लेखन संग जुड़े छत्तीसगढ़ी के मयारूक मन एकर बर हर दृष्टि ले सक्षम हें। फेर असल सवाल सरकार के नीयत अउ इरादा के हे। काबर ते सरकार ह एला राज्य स्तर म राजभाखा के तो दरजा दे दिए हावय, इहां राजभाषा आयोग के गठन कर दिये हावय। फेर इंकर एकोठन कारज ह ठोसहा नइ दिखय। साल म दू-तीन पइत साहित्यकार मन ल जोर-जार के खवा-पिया के बिदा कर दिए जाथे। जेन नेंव के असल बुता होना चाही वो दिशा म एको ठोसहा बुता आज तक नइ हो पावत हे। ए दिशा म न तो शिक्षा विभाग कुछू करत हे न आयोग करत हे। अइसे लागथे के सरकार के मनसा ए विषय म पोठ नइये।

पहिली ए विषय म कुछु चरचा करन त प्रदेश के जिम्मेदार लोगन मन केन्द्र सरकार के मुड़ म नरियर फोर देवत रिहिन हें के उन तो संविधान के आठवीं अनुसूची अभी तक छत्तीसगढ़ी ल शामिल नइ करत हें। असल म प्रदेश म अउ केन्द्र म आने-आने पारटी के सरकार हवय तेकर सेती वोमन इहां के कुछु चेत नइ करत हें।

ठीक हे, फेर अब तो दूनों जगा एके पारटी के सरकार बनवा डारे हावन न, त फेर अब का बात के बहाना हे। अब तो आठवीं अनुसूची के घलोक व्यवस्था करव, अउ प्राथमिक शिक्षा ल छत्तीसगढ़ी के माध्यम ले पढ़ाये के घलोक अउ फेर धीरे-धीरे उच्च शिक्षा अउ राजकाज के भाखा बनाये के घलोक।

सुशील भोले 
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Tuesday, 7 October 2014

चलौ कातिक नहाए ले..


बूढ़ा देव के रूप म आदि देव महादेव के संस्कृति जीयत छत्तीसगढ़ के जम्मो परब के जुड़ाव कोनो न कोनो रूप ले शिव परिवार ऊपर आधारित होथे। कातिक महीना म शिव पूजा के जेन इहां चलन हे तेला कातिक नहाना कहे जाथे। कातिक नहाए के सुरुवात लगते कातिक के एकम ले होथे, जेन पूरा अंधियारी पाख म गौरा-पूजा (शिव-पार्वती बिहाव परब) तक चलथे। अइसे कहे जाथे के भगवान शिव अउ पार्वती के बिहाव कातिक अमावस्या के होए रिहिसे तेकरे सेती इहां के जम्मो कुंवारी नोनी मन कातिक के ये अंधियारी पाख म मुंदरहा ले नहाथें अउ भगवान भोलेनाथ के बेलपत्ता, धोवा चांउर, फूल-फलहरी ले पूजा करथें।

गांव-गंवई म कातिक नहाए के उत्साह देखते बनथे। पारा भर के जम्मो नोनी मन एक-दूसर घर जा-जा के उनला उठाथें अउ तरिया जाथें जिहां नहा-धो के तरिया के पानी म दिया ढीलथें। बेरा पंगपंगाय के पहिली बरत दिया ल पानी म तउंरत देखबे त गजब के आनंद आथे। दिया ढीले के बाद फेर तरिया पार के मंदिर म भगवान भोलेनाथ के पूजा करे जाथे, अउ ए आसीस मांगे जाथे के उहू मनला भगवान भोलेनाथ जइसे योग्य वर मिलय।

कातिक नहाए के सुरूवात होए के संगे-संग इहां शिव-पार्वती बिहाव के नेवता दे के संदेशा गीत-सुवा गीत के रूप म घलोक शुरू हो जाथे। एकरे सेती जम्मो नोनी मन रोज संझा टोपली म माटी के बने सुवा ल मढ़ा के घरों-घर जाथें अउ वोला अंगना के बीच म राख के वोकर आंवर-भांवर घूम-घूम के ताली पीटत गीत गाथें। गीत-नृत्य के बाद घर गोसइन ह जेन सेर-चांउर, तेल अउ पइसा देथे तेला गौरा-गौैरी पूजा (शिव-पार्वती बिहाव) जेन कातिक अमावस्या के होथे तेकर खरचा (व्यवस्था) खातिर राखथें। अइसे किसम के कातिक नहाए के परब ह पूरा होथे। कतकों जगा कातिक नहाए के परब ल पूरा महीना भर घलोक करे जाथे। फेर एकर महत्व पंदरा दिन के अंधियारी पाख म जादा हे, जेमा बिहनिया कातिक नहाए,  संझा सुवा नाचे अउ अमावय के दिन ईसर देव (शिवजी) संग गौरी-गौरा बिहाव के जम्मो नोंग-जोंग शामिल होथे।

सुशील भोले 
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Thursday, 2 October 2014

मानवीय भूल...


छोटी-मोटी मानवीय भूल तो प्राय: हर व्यक्ति से हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उसके द्वारा किये गये अच्छे कार्यों को भी हम भूल जाएं.....

*सुशील भोले*

Wednesday, 1 October 2014

माटी पुत्र या माटी के पुतला?


हमर इहां कोनो भी मनखे ल मूल निवासी के रूप म चिन्हारी कराए खातिर एक सहज शब्द के उपयोग करे जाथे- 'माटी पुत्र" खास कर के राजनीति म। चाहे कोनो पार्टी के मनखे होय, कोनो पद म बइठे नेता होय सबके एके चिन्हारी- 'माटी पुत्र"। फेर मोला लगथे के 'माटी पुत्र" कहाए के अधिकार हर कोई ल नइ मिलना चाही, भलुक वोकर 'माटी" खातिर 'मया" अउ वोकरो ले बढ़ के माटी के पहचान जेला हमन भाखा, संस्कृति या अस्मिता के रूप म चिन्हारी करथन, एमा वोकर कतका अकन योगदान हे, एहू ल देखे जाना चाही।

काबर ते सिरिफ इहां पैदा होय भर म या सिरिफ इहां के भाखा-संस्कृति के गोठ भर कर दे म कोनो ल 'माटी पुत्र" के चिन्हारी नइ मिल जाए। भलुक एकर मन के करम ल या कहिन बुता ल घलोक देखे जाना चाही। आज छत्तीसगढ़ ल अलग राज बने चउदा बछर उरकगे हवय। फेर इहां के भाखा के, संस्कृति के, इहां के मूलधरम के अलगे चिन्हारी नइ बन पाए हे।

ताज्जुब तब होथे जब कोलकी-संगसी म नेतागिरी करइया मन ले लेके राज के मुखिया तक के बोली म इहां के भाखा, संस्कृति अउ संपूर्ण अस्मिता खातिर भारी अकन कारज करे के शेखी सुने बर मिलथे! अरे भइया.. भारी अकन कारज करे हावव त वोहर कोनो मेर दिखय काबर नहीं? आज तक इहां के भाखा ह, शिक्षा अउ राजकाज के भाखा काबर नइ बन पाए हे? इहां के संस्कृति ल आने प्रदेश ले आए मनखे मन के संस्कृति अउ ग्रंथ संग संघार के काबर लिखे अउ बताए जाथे? इहां के मूल 'आदि धरम" ल जाति-पाति अउ वर्ण व्यवस्था के दलदल म धंसे तथाकथित धरम के अंग के रूप में काबर चिन्हारी करे जाथे?

का इहां के माटी पुत्र मनला ए बात के समझ नइए। या इन समझ के घलोक अपन राजनीतिक ददा-बबा मन के जोहार-पैलगी करे के छोड़ अउ कुछ जानंय-समझंय नहीं?

मैं एकरे सेती एमन ल 'माटी के पुतला" कहिथौ! जे मन अपन भाखा-बोली, धरम-संस्कृति अउ इतिहास के गौरव ल नइ गोठिया सकंय, इंकर बढ़वार अउ रखवारी खातिर कुछु ठोस उदिम नइ कर सकंय, उन 'माटी पुत्र" कइसे हो सकथे, इन सब तो 'माटी के पुतला" ही कहाहीं न?

मैं वो तथाकथित साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार अउ अस्मिता के चारोंखुंट बगरे रखवार मनला घलोक इही श्रेणी म शामिल करथौं, जेमन भाखा-संस्कृति के बात ल, अस्मिता के गोठ ल सिरिफ मंच म माला पहिरे खातिर करथें। एकाद ठन सरकारी सम्मान ल अपन टोटा म ओरमाए खातिर करथें। जबकि ठोस भुइयां म इंकर मन के कारज शून्य होथे।

छत्तीसगढ़ी भाखा-संस्कृति खातिर कतकों अकन सरकारी-असरकारी आयोजन होवत रहिथे। फेर मोर ये प्रश्न हे- एकर मन के मंच म अतिथि-सतिथि के रूप म जेमन टोटा म माला ओरमा के बइठे रहिथें, बड़े-बड़े पदवी ले सम्मानित होवत रहिथें वोमा के कतका झन के योगदान छत्तीसगढ़ी भाखा, संस्कृति अउ अस्मिता खातिर ठोस होथे?

एक बात तो ठउका जानव के जब तक ढोंगी-पाखंडी अउ फर्जी किसम के मनखे मन मंच म सम्मान पाहीं अउ ठोसहा बुता करइया मन उपेक्षित रइहीं, तब तक छत्तीसगढ़ी के न तो विकास हो सकय, न तो वोकर अस्तित्व बांच सकय।

का ये सब हमर माटीपुत्र मन के आंखी म नइ दिखय? अउ नइ दिखय त उन माटीपुत्र कइसे हो सकथें? जेकर मन के आंखी म अंधरौटी छागे हवय, जेकर मन के मती ल लकवा मार दिये हवय, जेकर मन के हाथ-गोड़ ह सिरिफ अपन राजनीतिक आका मन के  जोहार-पैलगी करे खातिर हालथे-डोलथे वोमन सिरिफ 'माटी के पुतला" तो हो सकथें। जेन कठपुतली नाच बरोबर नाचे के छोड़ अउ कुछु नइ कर सकंय।
(फोटो-गूगल से साभार)

सुशील भोले 
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