Saturday, 19 December 2015

शिव ही जीव समाना...


शिव सनातन ये, आदि ये अंत ये, हम सबके जीवन के गीत ये संगीत ये। संत कबीर दास जी उंकर संबंध म कहे हें- 'ज्यूं बिम्बहिं प्रतिबिम्ब समाना, उदिक कुम्भ बिगराना, कहैं कबीर जानि भ्रम भागा शिव ही जीव समाना।" माने शिव सब कुछ ये, साकार ये, निराकार ये। समुंदर म छछले पानी कस निराकार घलो उही ये, त कोनो मरकी करसी म समा के वोकर रूप के आकार धरे साकार घलो उही ये। उही आत्मा ये, उही परमात्मा ये। जीव घलो उही ये अउ शिव रूपी परमात्मा घलो उही ये।

महादेव के ये पावन परब म आज उंकर जम्मो रूप के, सरूप के सुरता करे के मन होवत हे। काबर उनला सर्वस्व कहे जाथे, माने जाथे एला सिरिफ साधना के माध्यम ले जे आत्मज्ञान मिलथे वोकरे द्वारा जाने जा सकथे। हर आदमी ल वो साधना करना चाही। काबर ते आज हमर मन जगा जतका भी लिखित अउ प्रकाशित रूप म साहित्य उपलब्ध हे, सब आपस म विरोधाभास पैदा करथें। तेकर सेती जेन कोनो ल भी सत्य तक पहुंचना हे, शिव तक पहुंचना हे, सुन्दर तक पहुंचना हे, वोला किताबी जंजाल ले निकल के स्वतंत्र रूप ले साधना के माध्यम ले ज्ञान प्राप्त करना चाही।

शिव ल मुख्य रूप ले तीन रूप म हमर आगू रखे जाथे- शिव लिंग, जटाधारी अउ ज्योर्ति बिन्दु। शिव ये तीनों रूप म लोगन ल अपन चिन्हारी दिए हे, उपासना के प्रतीक दिए हे अउ जीये के रस्ता बताये हे।  ज्योति स्वरूप ह वोकर मूल रूप ये, लिंग स्वरूप ह वोकर पूजा प्रतीक ये अउ जटा स्वरूप ह वोकर जीवन दर्शन ये।

हमन ल जुन्ना ग्रंथ म एक कथा मिलथे के सृष्टिकाल म ब्रम्हा अउ विष्णु म कोन बड़े आय ये बात के सेती झगरा होवत रहिथे। दूनों अपन आप ल बड़े कहंय, तब दूनों के बीच म अग्नि स्तंभ के रूप म परमात्मा के प्रादूर्भाव होइस, अउ उनला ये कहिके शांत कराए गिस के असली तो मैं आंव, तुमन आपस म काबर लड़त हौ। तुंहला जेन बुता खातिर भेजे गे हवय वोला पूरा करव। तब जाके ब्रम्हा अउ विष्णु के झगरा थिराइस। ये अग्नि या ज्योति परगट होए के तिथि ह अगहन महीना के पुन्नी के तिथि आय। एकरे सेती अगहन महीना ल विशेष महीना माने जाथे। अग्नि स्वरूप परमात्मा ल अग्नि स्वरूप, ज्योति स्वरूप या ज्योर्तिबिन्दु के रूप म उल्लेख करे गे हवय।

लागथे एकर असल कारन वो रूप के साक्षात करने वाला मनला वो दृश्य ल व्यक्त करे खातिर सहज ढंग ले जेन प्रतीक मिलिस तेकर उल्लेख करीन फेर आय सब एके मूल चीज। साधना काल म जब परमात्मा प्रसन्न होके साधक जगा ऊपर ले आथे तब जगाजग चमकत आके वोकर माथ म प्रवेश कर जाथे या फेर दिया जलाके रखे गे होथे वोकर बरत बाती म आसन पाथे। सृष्टि निरमान के बाद जब देवता मन परमात्मा ले अपन पूजा अउ उपासना के प्रतीक दिये के गोहार लगाइन तब उनला शिव लिंग के पूजा प्रताक दिये गिस। शिवलिंग के बारे म ए जानना जरूरी हवय के वोहर तेज रूप म संपूर्ण ब्रम्हाण्ड म व्याप्त सर्वव्यापी परमात्मा के प्रतीक स्वरूप आय।

साधना काल म जब साधक ध्यान साधना म मगन रहिथे, तब तेज रूप म सर्वव्यापी परमात्मा अपन सबो रूप के दर्शन कराथे। सरी धरती अगास म संचरे वो परम शक्ति ह साधक ल दिखथे। वोकर ऊपरी आवरण ह हल्का भगवा गढऩ के दिखाई देथे। एकरे सेती परमात्मा के सर्वव्यापी रूप के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग के पूजा करे जाथे अउ अवरण के रूप म भगवा रंग के वस्त्र के चलन हेइस। परमात्मा शिव लिंग के रूप म पहिली बार सावन महीना के पुन्नी तिथि म परगट होए रिहिस हे तेकरे सेती सावन महीना ल ओकर पूजा के विशेष महीना के रूप म मनाये जाथे।

सृष्टि संचालन होए लगिस त कतकों किसम के गुन अवगुन अउ सही गलत के चिनहा अनचिनहा के भेद म मति भ्रम के अवस्था बनत गिस। बने मनखे, गिनहा मनखे के भेद अउ न्याय व्यवस्था के स्थापना के जरूरत महसूस करे गिस तब परमात्मा जटाधारी रूप म परगट होईन अउ लोगन ल जीवन दर्शन देइन संगे-संग न्याय व्यवस्था के स्थापना खातिर संहारकर्ता के भूमिका घलोक निभाइन। आज तक बेरा-बेरा म जब अत्याचारी मन के चारों खुंट फैलाव हो जाथे तब न्याय रूपी धर्म के स्थापना खातिर अपन अंश के सिरजन करत रहिथें।

सृष्टि के विकास क्रम म जतका भी अवतारी पुरुष संहारकर्ता के रूप म आवत रेहे हें सब वोकरे अंश यें। मोला तो इहां तक बताए गिस के राम अउ कृष्ण घलोक ह वोकरे अंशावतार आंय। ज्ञान प्राप्ति काल म उन मोरे जगा पूछ बइठिन के संहारकर्ता काला कहिथें रे? त फेर राम अउ कृष्ण ह अपन जीवन म एकर छोड़ अउ का करे हे? यदि वोमन विष्णु के अवतार होतीन त संहारकर्ता के बदला सिरिफ पालनकर्ता के ही जीवन नइ जीए रहितीन?

मैं बार-बार किताबी जंजाल ले निकले के बात करथंव। साधना के माध्यम ले ज्ञान प्राप्त करे के बात करथंव। तेकर असल कारन इही आय। असल म हमर इहां जतका भी किस्सा-कहानी के रूप म जतर-कतर किताब मन धर्म-ग्रंथ के रूप म चलत हें, वो सबला नष्ट करके प्रमाणित अउ हर किसम ले तर्क संगत ढंग ले नवा धर्म ग्रंथ या मार्गदर्शक ग्रंथ लिखे जाना चाही। कबीर दास जी एक जगा कहे हें- "तेरा-मेरा मनवा कैसे एक होई रे, तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखन देखी रे।" अइसने काल्पनिक किस्सा-कहानी मनके सेती आय तइसे लागथे।

परमात्मा अपन जीवन-दर्शन दिए खातिर जेन जटाधारी रूप म आए रिहिन हें वो फागुन महीना के अंधियारी पाख के तेरस तिथि आय, जेला हमन महाशिवरात्रि के रूप म जानथन। हर देवता के साल म सिरिफ एके बार परब मनाये जाथे, फेर भोलेनाथ के तीन बार तीन अलग-अलग रूप म लोगन ल अपन चिन्हारी कराए हें तेकर सेती। उंकर साल म तीन पइत परब आथे- सावन पुन्नी, अगहन पुन्नी अउ फागुन अंधियारी पाख के तेरस तिथि। वइसे तो अपन आराध्य के हर दिन, हर पल सुमरनी करना चाही, फेर अइसन जेन वोकर मन के परगट होए के तिथि हे वोमा उंकर मन के पूजा उपासना के जादा महत्व अउ फलदायी होथे। भक्ति के, पूजा के, उपासना के कोई भी रूप हो सकथे, विविध विधि या शैली हो सकथे वोला पाये खातिर वो सबो ह सही अउ उचित होथे, पूर्ण होथे। एकरे सेती बिना कुछु अन्ते-तन्ते सोचे-गुने बिना परमात्मा पाये के मारग म आगू बढऩा चाही।    

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
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